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A R Sahil "Aleeg"
khud-karda gunaahon ki saza dhoondh rahe hain
khud-karda gunaahon ki saza dhoondh rahe hain | ख़ुद-कर्दा गुनाहों की सज़ा ढूंढ रहे हैं
- A R Sahil "Aleeg"
ख़ुद-कर्दा
गुनाहों
की
सज़ा
ढूंढ
रहे
हैं
अब
चार
सू
हम
ख़ौफ़े-ख़ुदा
ढूंढ
रहे
हैं
- A R Sahil "Aleeg"
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तोड़
कर
तुझको
भला
मेरा
भी
क्या
बन
जाता
उल्टा
मैं
ख़ुद
की
मुहब्बत
प
सज़ा
बन
जाता
जितनी
कोशिश
है
तिरी
एक
तवज्जोह
के
लिए
उस
सेे
कम
में
तो
मैं
दुनिया
का
ख़ुदा
बन
जाता
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Ashutosh Vdyarthi
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तस्वीर
में
जो
क़ैद
था
वो
शख़्स
रात
को
ख़ुद
ही
फ़्रेम
तोड़
के
पहलू
में
आ
गया
Adil Mansuri
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ज़िंदगी
से
बड़ी
सज़ा
ही
नहीं
और
क्या
जुर्म
है
पता
ही
नहीं
Krishna Bihari Noor
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हमीं
तक
रह
गया
क़िस्सा
हमारा
किसी
ने
ख़त
नहीं
खोला
हमारा
मु'आफ़ी
और
इतनी
सी
ख़ता
पर
सज़ा
से
काम
चल
जाता
हमारा
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Shariq Kaifi
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मसाइल
तो
बहुत
से
हैं
मगर
बस
एक
ही
हल
है
सहरस
शाम
तक
सर
मेरा
है
बेगम
की
चप्पल
है
मेरे
मालिक
भला
इस
सेे
बुरी
भी
क्या
सज़ा
होगी
मेरा
शादीशुदा
होना
ही
दोज़ख़
की
रिहर्सल
है
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Paplu Lucknawi
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जुर्म
में
हम
कमी
करें
भी
तो
क्यूँँ
तुम
सज़ा
भी
तो
कम
नहीं
करते
Jaun Elia
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एक
मुद्दत
से
परिंदे
की
तरह
ये
क़ैद
है
रूह
मेरे
जिस्म
से
'क़ासिद'
रिहा
होती
नहीं
Gurbir Chhaebrra
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वो
मेरा
जब
न
हो
सका
तो
फिर
यही
सज़ा
रहे
किसी
को
प्यार
जब
करूँँ
वो
छुप
के
देखता
रहे
Mazhar Imam
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मिरे
गुनाह
की
मुझ
को
सज़ा
नहीं
देता
मिरा
ख़ुदा
कहीं
नाराज़
तो
नहीं
मुझ
से
Shahid Zaki
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हसीन
लड़की
से
दिल
लगाना
भी
इक
ख़ता
है
मुझे
पता
है
अगर
सज़ा
में
मिले
क़ज़ा
तो
अलग
मज़ा
है
मुझे
पता
है
Jatin shukla
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गर
ये,
चौदह
फ़रवरी
का
दिन
है
इज़हार-ए-मोहब्बत
का
सो
रुमी
अपनी
ग़ज़लों
को
ग़ज़ाला
और
नीलोफ़र
दे,
पूरी
रस्म
कर
लो
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
की
ओर
उठे
आँखें
ये
है
बाद
की
बात
इश्क़
का
नाम
पुकारूँ
भी
तो
घिन
आती
है
A R Sahil "Aleeg"
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उँगली
को
अपनी
दूसरों
पर
उठाते
भूल
जाते
हैं
वो
ख़ुद
की
चारों
उँगली
उन्हीं
के
जानिब
उठ
चुकी
होती
हैं
A R Sahil "Aleeg"
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जो
भी
थे
रिश्ते
नाते
दोस्त
सब
अपने
पराए
छोड़
आया
फ़क़त
इक
तेरी
ख़ातिर
सब
का
दिल
मैं
इश्क़
में
यूँँ
तोड़
आया
A R Sahil "Aleeg"
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हर
ख़ता
करते
हैं
नज़र-अंदाज़
इश्क़
अंधा
कभी
नहीं
होता
A R Sahil "Aleeg"
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