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A R Sahil "Aleeg"
hain dafn raaz shaayri men to kaii yahaañ magar
hain dafn raaz shaayri men to kaii yahaañ magar | हैं दफ़्न राज़ शा'इरी में तो कई यहाँ मगर
- A R Sahil "Aleeg"
हैं
दफ़्न
राज़
शा'इरी
में
तो
कई
यहाँ
मगर
सवाल
पूछ
कर
यूँँ
ज़ख़्म
को
हरा
तो
मत
करो
- A R Sahil "Aleeg"
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सजनी
की
आँखों
में
छुप
कर
जब
झाँका
बिन
होली
खेले
ही
साजन
भीग
गया
Musavvir Sabzwari
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अब
मज़ीद
उस
सेे
ये
रिश्ता
नहीं
रक्खा
जाता
जिस
सेे
इक
शख़्स
का
पर्दा
नहीं
रक्खा
जाता
पढ़ने
जाता
हूँ
तो
तस्में
नहीं
बाँधे
जाते
घर
पलटता
हूँ
तो
बस्ता
नहीं
रक्खा
जाता
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Tehzeeb Hafi
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अव्वल
तो
तेरी
दोस्ती
पर
शक
नहीं
कोई
और
दूसरा
ये
मुझको
तेरे
राज़
पता
हैं
Tanoj Dadhich
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जवाँ
होने
लगे
जब
वो
तो
हम
से
कर
लिया
पर्दा
हया
यक-लख़्त
आई
और
शबाब
आहिस्ता
आहिस्ता
Ameer Minai
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जो
तेरी
बाँहों
में
हँसती
रही
है
खेली
है
वो
लड़की
राज़
नहीं
है
कोई
पहेली
है
हाँ
मेरा
हाथ
पकड़
कर
झटक
दिया
उसने
सहारा
दे
के
बताया
कि
तू
अकेली
है
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Tajdeed Qaiser
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वो
एक
राज़
जो
मुद्दत
से
राज़
था
ही
नहीं
उस
एक
राज़
से
पर्दा
उठा
दिया
गया
है
Aziz Nabeel
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दीवारें
छोटी
होती
थीं
लेकिन
पर्दा
होता
था
तालों
की
ईजाद
से
पहले
सिर्फ़
भरोसा
होता
था
Azhar Faragh
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मोहब्बत
को
छुपाए
लाख
कोई
छुप
नहीं
सकती
ये
वो
अफ़्साना
है
जो
बे-कहे
मशहूर
होता
है
Lala Madhav Ram Jauhar
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बे-ख़ुदी
बे-सबब
नहीं
'ग़ालिब'
कुछ
तो
है
जिस
की
पर्दा-दारी
है
Mirza Ghalib
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चुप
रहते
हैं
चुप
रहने
दो
राज़
बताओ
खोले
क्या
बात
वफ़ा
की
तुम
करती
हो
बोलो
हम
कुछ
बोले
क्या
उल्फ़त
तो
अफ़साना
है
तुम
करती
खूब
सियासत
हो
हम
भी
हैं
मक़बूल
बहुत
अब
बोल
किसी
के
होलें
क्या
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Anand Raj Singh
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शोर
है
सारे
मह-जबीनों
में
इक
नगीना
है
सौ
नगीनों
में
वो
शराफ़त
का
एक
पुतला
है
हाँ
मगर
साथ
के
कमीनों
में
सब
ने
मतलब
की
खींच
कर
सरहद
बाँट
दी
है
ज़मीं
ज़मीनों
में
मोड़
कर
मुँह
गया
जो
ये
दरिया
आग
दे
दी
गई
सफ़ीनों
में
अब
दिमाग़ों
में
ऐसे
है
नफ़रत
गोलियाँ
जैसे
मैगज़ीनों
में
मुझ
को
ख़तरा
तो
पैरहन
से
है
साँप
बैठे
है
आस्तीनों
में
हम
को
बस
शा'इरी
से
है
मतलब
आप
रहिएगा
नामचीनों
में
देखिए
दिल
दिमाग़
और
ये
इश्क़
जंग
जारी
है
कब
से
तीनों
में
खोटे
सिक्के
हैं
हम
बता
साहिल
कौन
रक्खेगा
अब
ख़ज़ीनों
में
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A R Sahil "Aleeg"
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रिज्क़
को
पाक
रक्खो
वर्ना
रूह
बातिन
नहीं
हो
सकता
A R Sahil "Aleeg"
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हुआ
है
हाल
मेरा
मुद्दतों
के
बाद
ये
'साहिल'
गुज़रने
को
है
चौथा
दिन,
नहीं
नैनों
में
है
निद्रा
A R Sahil "Aleeg"
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ग़ज़ल
ये
जो
सुनाई
आपने
महफ़िल
में
क्या
कहना
ग़ज़ल
ख़ुद
कह
रही
है
ये
ज़मीं
तो
है
फ़लाने
की
A R Sahil "Aleeg"
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हजारों
ऐब
गिनवा
मैं
भी
सकता
हूँ
वफ़ा
का
ये
तक़ाज़ा
है
हूँ
चुप
अब
तक
A R Sahil "Aleeg"
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