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A R Sahil "Aleeg"
hai use khwaahish ab gumnaami ki shaayad
hai use khwaahish ab gumnaami ki shaayad | है उसे ख़्वाहिश अब गुमनामी की शायद
- A R Sahil "Aleeg"
है
उसे
ख़्वाहिश
अब
गुमनामी
की
शायद
जा
रहा
महफ़िल
शोहरत
की,
छोड़
कर
वो
- A R Sahil "Aleeg"
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उसने
महफ़िल
से
उठाया
हमको
जिसको
पलकों
पे
बिठाया
हमने
Vishal Bagh
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चराग़
घर
का
हो
महफ़िल
का
हो
कि
मंदिर
का
हवा
के
पास
कोई
मसलहत
नहीं
होती
Waseem Barelvi
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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पहले
थोड़ी
मुश्किल
होगी
आगे
लेकिन
मंज़िल
होगी
सब
बाराती
शायर
होंगे
मेरी
शादी
महफ़िल
होगी
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Tanoj Dadhich
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ये
गूँगों
की
महफ़िल
है
निकलना
ही
पड़ेगा
क्या
इतनी
ख़ता
कम
है
कि
हम
बोल
पड़े
हैं
Waseem Barelvi
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तेरे
होते
हुए
महफ़िल
में
जलाते
हैं
चराग़
लोग
क्या
सादा
हैं
सूरज
को
दिखाते
हैं
चराग़
Ahmad Faraz
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पहले
कहता
है
जुनूँ
उसका
गिरेबान
पकड़
फिर
मेरा
दिल
मुझे
कहता
है
इधर
कान
पकड़
ऐसी
वहशत
भी
न
हो
घर
के
दरो
बाम
कहें
कोई
आवाज़
ही
ले
आ
कोई
मेहमान
पकड़
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Azbar Safeer
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मैं
ने
आबाद
किए
कितने
ही
वीराने
'हफ़ीज़'
ज़िंदगी
मेरी
इक
उजड़ी
हुई
महफ़िल
ही
सही
Hafeez Banarasi
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तुम
हुस्न
की
ख़ुद
इक
दुनिया
हो
शायद
ये
तुम्हें
मालूम
नहीं
महफ़िल
में
तुम्हारे
आने
से
हर
चीज़
पे
नूर
आ
जाता
है
Sahir Ludhianvi
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मुझे
अँधेरे
से
बात
करनी
है
सो
करा
दो,
दिया
बुझा
दो
कुछ
एक
लम्हों
को
रौशनी
का
गला
दबा
दो,
दिया
बुझा
दो
रिवाज़-ए-महफ़िल
निभा
रहा
हूँ
बता
रहा
हूँ
मैं
जा
रहा
हूँ
मुझे
विदा
दो,
जो
रोना
चाहे
उन्हें
बुला
दो,
दिया
बुझा
दो
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Vikram Gaur Vairagi
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इश्क़
में
तो
झूठ
कोई
भी
नहीं
कहता
जहाँ
में
इस
कथा
में
सबका
अपना
अपना
सच
और
ज़ाविया
है
A R Sahil "Aleeg"
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गर
ये,
चौदह
फ़रवरी
का
दिन
है
इज़हार-ए-मोहब्बत
का
सो
रुमी
अपनी
ग़ज़लों
को
ग़ज़ाला
और
नीलोफ़र
दे,
पूरी
रस्म
कर
लो
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
ने
ये
हुनर
भी
सिखलाया
दर्द
को
शे'र
में
पिरोता
हूँ
A R Sahil "Aleeg"
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वफ़ा
की
राह
झूठी
रहबरी
ने
दिए
ग़म
इश्क़
की
जादूगरी
ने
बहुत
से
इश्क़
का
ख़ूँ
कर
दिया
है
बहुत
तोड़े
है
दिल
इस
फ़रवरी
ने
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A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
तौफ़ीक़
भी
है
क़िस्मत
भी
इश्क़
मिलता
नहीं
त'अक़्क़ुब
से
A R Sahil "Aleeg"
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