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anupam shah
tumhaari ungliyon par yaar ye patthar nahin janchte
tumhaari ungliyon par yaar ye patthar nahin janchte | तुम्हारी उँगलियों पर यार ये पत्थर नहीं जँचते
- anupam shah
तुम्हारी
उँगलियों
पर
यार
ये
पत्थर
नहीं
जँचते
मिरी
मानो
किसी
'आशिक़
को
उँगली
पर
नचाओ
तुम
- anupam shah
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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उनके
गेसू
खुलें
तो
यार
बने
बात
मेरी
इक
रबर
बैंड
ने
जकड़ी
हुई
है
रात
मेरी
Zubair Ali Tabish
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और
फिर
लोग
यही
कहते
फिरेंगे
इक
दिन
यार
कल
ही
तो
मेरी
बात
हुई
थी
उस
सेे
Saad Ahmad
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उसको
जो
कुछ
भी
कहूँ
अच्छा
बुरा
कुछ
न
करे
यार
मेरा
है
मगर
काम
मेरा
कुछ
न
करे
दूसरी
बार
भी
पड़
जाए
अगर
कुछ
करना
आदमी
पहली
मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
न
करे
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Abid Malik
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यार
बिछड़कर
तुमने
हँसता
बसता
घर
वीरान
किया
मुझको
भी
आबाद
न
रक्खा
अपना
भी
नुक़्सान
किया
Ali Zaryoun
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ख़ुशियाँ
उसी
के
साथ
हैं
जो
ग़म
गुसार
है
ऐसे
हरेक
शख़्स
ही
दुनिया
का
यार
है
Sunny Seher
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यार
आसान
होती
नहीं
यह
कला
मौन
रहना
बड़ी
ही
चुनौती
रही
Aniket sagar
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ये
आरज़ू
भी
बड़ी
चीज़
है
मगर
हमदम
विसाल-ए-यार
फ़क़त
आरज़ू
की
बात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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कभी
अल्लाह
मियाँ
पूछेंगे
तब
उनको
बताएँगे
किसी
को
क्यूँ
बताएँ
हम
इबादत
क्यूँ
नहीं
करते
Farhat Ehsaas
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तनक़ीद
न
तक़रार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
हैरत
है
मेरे
यार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
गूँगों
को
तकल्लुक़
के
मवाक़े
हैं
मुयस्सर
हम
माहिर-ए-गुफ़्तार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
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Ahmad Abdullah
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आज
की
शाम
ज़रा
रात
तक
ठहर
जाए
काश
ऐसा
भी
हो
ये
चांँद
भी
न
घर
जाए
anupam shah
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होंठ
खोले
हुए
खिलखिलाए
हुए
एक
अर्सा
हुआ
मुस्कुराए
हुए
ऐसे
ख़्वाबों
की
ता'बीर
मुमकिन
नहीं
संग
तेरे
जो
लम्हे
बिताए
हुए
मुझ
सेे
रूठा
मुक़द्दर
भी
तेरी
तरह
मुँह
घुमाए
हुए
सिर
झुकाए
हुए
आइनों
से
निकाले
हुए
अक्स
हैं
एक
तस्वीर
में
हम
छुपाए
हुए
आ
गए
हम
अँधेरों
में
इक
रोज़
फिर
इक
दिए
को
सहारा
बनाए
हुए
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anupam shah
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किसे
इतनी
कहानी
चाहिए
थी
मुहब्बत
जावेदानी
चाहिए
थी
वही
इक
बात
कर
देगी
परेशाँ
वही
जो
भूल
जानी
चाहिए
थी
उसे
आख़िर
में
बस
शिकवे
दिखे
थे
मुहब्बत
याद
आनी
चाहिए
थी
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anupam shah
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आप
जो
हैं
हसीं
तो
अच्छा
है
कौन
सा
मेरे
काम
आएंँगे
anupam shah
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वही
है
आदमी
तक़दीर
वाला
जिसे
दो
वक़्त
का
हासिल
निवाला
तेरी
क़ुरबत
में
खाए
हैं
यूँँ
धोखे
कि
जैसे
आसतीं
में
साँप
पाला
हमारी
राह
में
ही
आ
गिरा
फिर
वही
पत्थर
जो
तबियत
से
उछाला
मुहब्बत
बाद
मेरे
तुमने
जो
की
मेरा
ग़ुस्सा
रक़ीबों
पर
निकाला
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anupam shah
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