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anupam shah
zameen par to ha
zameen par to ha | ज़मीं पर तो हमें अब ग़म मिलेंगे
- anupam shah
ज़मीं
पर
तो
हमें
अब
ग़म
मिलेंगे
चलो
अब
आसमाँ
में
हम
मिलेंगे
मैं
अब
तक
राह
में
बैठा
हूँ
देखो
जो
तू
कहकर
गया
था
हम
मिलेंगे
करो
पड़ताल
मेरी
क्या
मिलेगा
मिरे
जीवन
के
पेच-ओ-ख़म
मिलेंगे
हमें
उस
आख़िरी
दिन
ग़म
नहीं
था
ख़ुशी
ये
थी
कि
कम
से
कम
मिलेंगे
मरेंगे
जब
कभी
भी
देखना
तुम
तुम्हें
हर
इक
गली
मातम
मिलेंगे
- anupam shah
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आँख
में
नम
तक
आ
पहुँचा
हूँ
उसके
ग़म
तक
आ
पहुँचा
हूँ
पहली
बार
मुहब्बत
की
थी
आख़री
दम
तक
आ
पहुँचा
हूँ
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Khalil Ur Rehman Qamar
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पत्थर
के
जिगर
वालो
ग़म
में
वो
रवानी
है
ख़ुद
राह
बना
लेगा
बहता
हुआ
पानी
है
Bashir Badr
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अब
क्या
ही
ग़म
मनाएँ
कि
क्या
क्या
हुआ
मियाँ
बर्बाद
होना
ही
था
सो
बर्बाद
हो
गए
shaan manral
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मज़ाक
सहना
नहीं
है
हँसी
नहीं
करनी
उदास
रहने
में
कोई
कमी
नहीं
करनी
Swapnil Tiwari
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आधी
से
ज़ियादा
शब-ए-ग़म
काट
चुका
हूँ
अब
भी
अगर
आ
जाओ
तो
ये
रात
बड़ी
है
Saqib lakhanavi
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इस
कदर
मत
उदास
हो
जैसे
ये
मोहब्बत
का
आख़िरी
दिन
है
Idris Babar
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जब
भी
आता
है
दिसम्बर
ग़म
के
टाँके
खुलते
हैं
याद
है
यूँँ
तेरा
जाना
और
कहना
ख़ुश
रहो
Neeraj Neer
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अब
कारगह-ए-दहर
में
लगता
है
बहुत
दिल
ऐ
दोस्त
कहीं
ये
भी
तिरा
ग़म
तो
नहीं
है
Majrooh Sultanpuri
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जीना
मुश्किल
है
के
आसान,
ज़रा
देख
तो
लो
लोग
लगते
हैं
परेशान,
ज़रा
देख
तो
लो
इन
चराग़ों
के
तले
ऐसे
अँधेरे
क्यूँँ
हैं?
तुम
भी
रह
जाओगे
हैरान,
ज़रा
देख
तो
लो
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Javed Akhtar
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बारे
दुनिया
में
रहो
ग़म-ज़दा
या
शाद
रहो
ऐसा
कुछ
कर
के
चलो
याँ
कि
बहुत
याद
रहो
Meer Taqi Meer
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किसी
पत्थर
की
बस्ती
में
वो
लम्हा
छुप
के
बैठा
है
अभी
तो
कुछ
बरस
लग
जाएँगे
दीवार
ढहने
में
anupam shah
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आज
की
शाम
ज़रा
रात
तक
ठहर
जाए
काश
ऐसा
भी
हो
ये
चांँद
भी
न
घर
जाए
anupam shah
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होंठ
खोले
हुए
खिलखिलाए
हुए
एक
अर्सा
हुआ
मुस्कुराए
हुए
ऐसे
ख़्वाबों
की
ता'बीर
मुमकिन
नहीं
संग
तेरे
जो
लम्हे
बिताए
हुए
मुझ
सेे
रूठा
मुक़द्दर
भी
तेरी
तरह
मुँह
घुमाए
हुए
सिर
झुकाए
हुए
आइनों
से
निकाले
हुए
अक्स
हैं
एक
तस्वीर
में
हम
छुपाए
हुए
आ
गए
हम
अँधेरों
में
इक
रोज़
फिर
इक
दिए
को
सहारा
बनाए
हुए
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anupam shah
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वही
मंज़र
मुझे
हर
बार
नज़र
आता
है
आँख
मूँदूँ
तो
मुझे
यार
नज़र
आता
है
ऐसे
तो
मौत
का
मेरी
कोई
क़ातिल
ही
नहीं
वैसे
हर
शख़्स
गुनहगार
नज़र
आता
है
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anupam shah
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मेरे
हालात
मुझको
इस
तरह
मजबूर
कर
बैठे
जिसे
अपना
समझ
बैठे
उसे
ही
दूर
कर
बैठे
anupam shah
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