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anupam shah
tere hone ka ye asar aaya
tere hone ka ye asar aaya | तेरे होने का ये असर आया
- anupam shah
तेरे
होने
का
ये
असर
आया
याद
मुझको
तू
उम्र
भर
आया
तुझको
मंज़िल
बना
के
चलता
था
मेरे
हिस्से
में
बस
सफ़र
आया
जो
भी
छूटा
है
राह
में
मुझ
सेे
लौटकर
फिर
नहीं
वो
घर
आया
दर्द
हद
से
गुज़र
गया
मेरा
जब
भी
तेरा
कभी
शहर
आया
आइना
साफ़
कर
रहा
था
मैं
मेरा
दुश्मन
मुझे
नज़र
आया
- anupam shah
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बड़ा
घाटे
का
सौदा
है
'सदा'
ये
साँस
लेना
भी
बढ़े
है
उम्र
ज्यूँँ-ज्यूँँ
ज़िंदगी
कम
होती
जाती
है
Sada Ambalvi
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अब
तक
हमारी
उम्र
का
बचपन
नहीं
गया
घर
से
चले
थे
जेब
के
पैसे
गिरा
दिए
Nashtar Khaanqahi
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क्या
हुआ
जो
मुझे
हम-उम्र
मोहब्बत
न
मिली
मेरी
ख़्वाहिश
भी
यही
थी
कि
बड़ी
आग
लगे
Muzdum Khan
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कुछ
इस
तरह
से
गुज़ारी
है
ज़िन्दगी
जैसे
तमाम
उम्र
किसी
दूसरे
के
घर
में
रहा
Ahmad Faraz
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उम्र-भर
के
सज्दों
से
मिल
नहीं
सकी
जन्नत
ख़ुल्द
से
निकलने
को
इक
गुनाह
काफ़ी
है
Ambreen Haseeb Ambar
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काँटों
से
दिल
लगाओ
जो
ता-उम्र
साथ
दें
फूलों
का
क्या
जो
साँस
की
गर्मी
न
सह
सकें
Akhtar Shirani
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दिल
ये
करता
है
कि
इस
उम्र
की
पगडंडी
पर
उलटे
पैरों
से
चलूँ
फिर
वही
लड़का
हो
जाऊँ
Mehshar Afridi
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वो
जो
गीत
तुम
ने
सुना
नहीं
मेरी
उम्र
भर
का
रियाज़
था
मेरे
दर्द
की
थी
वो
दास्ताँ
जिसे
तुम
हँसी
में
उड़ा
गए
Amjad Islam Amjad
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हम
जिसे
देखते
रहते
थे
उम्र
भर
काश
वो
इक
नज़र
देखता
हम
को
भी
Mohsin Ahmad Khan
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बोझ
उठाए
हुए
फिरती
है
हमारा
अब
तक
ऐ
ज़मीं
माँ
तिरी
ये
उम्र
तो
आराम
की
थी
Parveen Shakir
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ज़रूरी
है
अगर
दीवार
होना
दरमियाँ
अपने
तो
इस
दीवार
में
तुम
एक
रौशनदान
भी
देना
anupam shah
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अधूरी
बात
का
मतलब
बनाकर
वो
झगड़ा
भी
मुझी
को
सब
बनाकर
उसे
फिर
बारहा
यूँँ
चूमता
था
मैं
काग़ज़
पर
तिरे
दो
लब
बनाकर
ज़माने
भर
से
हम
तो
लड़
गए
थे
तुम्हारी
बात
को
मज़हब
बनाकर
मिरा
क्या
है
मैं
बातों
का
धनी
हूँ
कि
जब
चाहो
कहूंगा
तब
बनाकर
ये
मैने
क्या
किया
है
ज़िन्दगी
का
सबा
को
जी
गया
हूँ
शब
बनाकर
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anupam shah
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हाथ
पकड़ूँ
या
कि
आँखों
को
मैं
उसकी
चूम
लूँ
अब
उसे
कहने
की
ख़ातिर
और
कुछ
तो
है
नहीं
anupam shah
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वही
है
आदमी
तक़दीर
वाला
जिसे
दो
वक़्त
का
हासिल
निवाला
तिरी
क़ुरबत
में
खाए
हैं
यूँँ
धोखे
कि
जैसे
आसतीं
में
सांँप
पाला
हमारी
राह
में
ही
आ
गिरा
फिर
वही
पत्थर
जो
तबियत
से
उछाला
मुहब्बत
बाद
मेरे
तुमने
जो
की
मेरा
ग़ुस्सा
रक़ीबों
पर
निकाला
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anupam shah
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तुम्हें
सोचकर
के
मैं
यूँँ
खिल
रहा
हूँ
कि
करवट
बदल
कर
तुम्हें
मिल
रहा
हूँ
वो
जिस
पर
से
लौटे
हैं
सारे
मुसाफ़िर
मैं
ऐसे
ही
दरिया
का
साहिल
रहा
हूँ
बहुत
वक़्त
बीता
समझने
में
ये
भी
मैं
आसाँ
रहा
हूँ
या
मुश्किल
रहा
हूँ
मुझे
छोड़ने
का
गुमाँ
यूँँ
न
करना
न
जाने
मैं
कितनों
की
मंज़िल
रहा
हूँ
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anupam shah
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