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Anmol Mishra
kisi ko raat men sar par muyassar chat nahin hoti
kisi ko raat men sar par muyassar chat nahin hoti | किसी को रात में सर पर मुयस्सर छत नहीं होती
- Anmol Mishra
किसी
को
रात
में
सर
पर
मुयस्सर
छत
नहीं
होती
किसी
छत
के
भी
सर
पे
छत
बनी
होती
है
क्या
समझे
- Anmol Mishra
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जिस
पर
हमारी
आँख
ने
मोती
बिछाए
रात
भर
भेजा
वही
काग़ज़
उसे
हम
ने
लिखा
कुछ
भी
नहीं
Bashir Badr
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मैं
जिस
के
साथ
कई
दिन
गुज़ार
आया
हूँ
वो
मेरे
साथ
बसर
रात
क्यूँँ
नहीं
करता
Tehzeeb Hafi
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बिगड़
गई
थी
जो
दुनिया
सॅंवार
दी
हमने
चढ़ा
के
सर
पे
मुहब्बत
उतार
दी
हमने
अँधेरी
रात
किसी
बे-वफ़ा
की
यादों
में
बहुत
तवील
थी
लेकिन
गुज़ार
दी
हमने
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Hameed Sarwar Bahraichi
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क्या
बैठ
जाएँ
आन
के
नज़दीक
आप
के
बस
रात
काटनी
है
हमें
आग
ताप
के
कहिए
तो
आप
को
भी
पहन
कर
मैं
देख
लूँ
मा'शूक़
यूँँ
तो
हैं
ही
नहीं
मेरी
नाप
के
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Farhat Ehsaas
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थोड़ा
सा
अक्स
चाँद
के
पैकर
में
डाल
दे
तू
आ
के
जान
रात
के
मंज़र
में
डाल
दे
Kaif Bhopali
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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है
किसी
जालिम
उदू
की
घात
दरवाज़े
में
है
या
मसाफ़त
है
नई
या
रात
दरवाज़े
में
है
जिस
तरहा
उठती
है
नजरें
बे-इरादा
बार-बार
साफ़
लगता
है
के
कोई
बात
दरवाजे
में
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Farhat Abbas Shah
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लड़ाई
है
तो
अच्छा
रात-भर
यूँँ
ही
बसर
कर
लो
हम
अपना
मुँह
इधर
कर
लें
तुम
अपना
मुँह
उधर
कर
लो
Muztar Khairabadi
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तन्हाई
के
हुजूम
में
वो
एक
तेरी
याद
जैसे
अँधेरी
रात
में
जलता
हुआ
दिया
Sagheer Lucky
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सौ
चाँद
भी
चमकेंगे
तो
क्या
बात
बनेगी
तुम
आए
तो
इस
रात
की
औक़ात
बनेगी
Dagh Dehlvi
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क़ीमती
स्याही
भरी
जिस
जिस
क़लम
में
आँसुओं
की
वक़्त
पे
वो
भूल
बैठे
ये
ग़लत
ये
ठीक
सा
है
बोलते
थे
बोल
जो
ता'रीफ़
में
हर
रोज़
मेरी
एक
दिन
वो
बोल
बैठे
आपकी
ता'रीफ़
क्या
है
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Anmol Mishra
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रात
की
वहशत
को
जानो
डर
गए
बोल
लो
ख़ुद
से
कभी
लो
डर
गए
इश्क़
के
जलते
चराग़ों
क्या
हुआ
तुम
अभी
से
बुझ
रहे
हो
डर
गए
जिस्म
के
हर
मोड़
को
तो
छू
लिया
रूह
पर
भी
हाथ
रक्खो
डर
गए
झूलना
पंखे
से
चाहा
जब
कभी
देखकर
कमज़ोर
छत
को
डर
गए
मानता
हूँ
मैं
ग़लत
था
ठीक
है
आँख
से
आँखें
मिलाओ
डर
गए
रोज़
हालातों
से
हम
लड़ते
रहे
जीते
जी
वो
मर
गए
जो
डर
गए
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Anmol Mishra
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लगाओ
आग
आओ
भाईसाहब
लगाकर
फिर
बुझाओ
भाईसाहब
अगर
अब
पाप
से
मन
भर
गया
हो
उठो
गंगा
नहाओ
भाईसाहब
ये
नाटक
ब्लॉक
और
अनब्लॉक
का
बस
चलो
नंबर
मिटाओ
भाईसाहब
अगर
कई
लाख
का
रुतबा
तुम्हारा
ज़रा
ज़ीरो
हटाओ
भाईसाहब
यहीं
बैठा
हूँ
मेरे
क़ातिलों
को
बुलाकर
आज
लाओ
भाईसाहब
बहुत
बोए
ज़मीं
में
रोज़
सरसों
हथेली
पर
उगाओ
भाईसाहब
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Anmol Mishra
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कट
गईं
वो
भी
पतंगें
जिनके
माँझे
तेज़
थे
तुम
भी
ज़्यादा
उड़
रहे
हो
हश्र
अपना
सोच
लो
Anmol Mishra
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तेरे
हर
फ़न
पर
लानत
है
तेरे
जीवन
पर
लानत
है
गीत
ग़ज़ल
कविता
नज़्मों
पर
तेरे
हर
धन
पर
लानत
है
मरने
की
कोशिश
में
ज़िंदा
इस
मुर्दा
तन
पर
लानत
है
जिसने
तेरी
शक्ल
छिपाई
बैरी
चिलमन
पर
लानत
है
हाथ
मिलाकर
यार
कहा
था
ऐसे
दुश्मन
पर
लानत
है
हल्के
झोंके
में
टूटा
जो
नाज़ुक
बंधन
पर
लानत
है
फ़िक्र
नहीं
जिस
में
दुनिया
की
उस
पागलपन
पर
लानत
है
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Anmol Mishra
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