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Aniket sagar
jhuki palken teri jaana qayamat dhaa rahi hain
jhuki palken teri jaana qayamat dhaa rahi hain | झुकी पलकें तेरी जाना क़यामत ढा रही हैं
- Aniket sagar
झुकी
पलकें
तेरी
जाना
क़यामत
ढा
रही
हैं
तरन्नुम
में
लगें
कोई
ग़ज़ल
सी
गा
रही
हैं
- Aniket sagar
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मुक़र्रर
दिन
नहीं
तो
लम्हा-ए-इमकान
में
आओ
अगर
तुम
मिल
नहीं
सकती
तो
मेरे
ध्यान
में
आओ
बला
की
ख़ूब-सूरत
लग
रही
हो
आज
तो
जानाँ
मुझे
इक
बात
कहनी
थी
तुम्हारे
कान
में..
आओ
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Darpan
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आज
भी
शायद
कोई
फूलों
का
तोहफ़ा
भेज
दे
तितलियाँ
मंडला
रही
हैं
काँच
के
गुल-दान
पर
Shakeb Jalali
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इश्क़
अगर
बढ़ता
है
तो
फिर
झगड़े
भी
तो
बढ़ते
हैं
आमदनी
जब
बढ़ती
है
तो
ख़र्चे
भी
तो
बढ़ते
हैं
माना
मंज़िल
नहीं
मिली
है
हमको
लेकिन
रोज़ाना
एक
क़दम
उसकी
जानिब
हम
आगे
भी
तो
बढ़ते
हैं
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Tanoj Dadhich
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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न
हम-सफ़र
न
किसी
हम-नशीं
से
निकलेगा
हमारे
पाँव
का
काँटा
हमीं
से
निकलेगा
Rahat Indori
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उसे
पागल
बनाती
फिर
रही
हो
जिसे
शौहर
बनाना
चाहिए
था
Arvind Inaayat
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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पास
मैं
जिसके
हूँ
वो
फिर
भी,
अच्छा
लड़का
ढूँढ़
रही
है
उसने
लगा
रक्खा
है
चश्मा,
और
वो
चश्मा
ढूँढ़
रही
है
फ़ोन
किया
मैंने
और
पूछा,
अब
तक
घर
से
क्यूँँ
नहीं
निकली
उस
ने
कहा
मुझ
सेे
मिलने
का,
एक
बहाना
ढूँढ़
रही
है
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Tanoj Dadhich
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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मुझ
में
अब
मैं
नहीं
रही
बाक़ी
मैं
ने
चाहा
है
इस
क़दर
तुम
को
Ambreen Haseeb Ambar
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ख़ामोशी
सागर
तेरी
खलने
लगी
मौज़
ख़ुशियों
की
उठा
दे
इक
दफ़ा
Aniket sagar
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करो
कोशिश
लकीरों
को
मिटाने
की
मुकद्दर
में
लिखा
बदला
नहीं
जाता
Aniket sagar
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यार
आसान
होती
नहीं
यह
कला
मौन
रहना
बड़ी
ही
चुनौती
रही
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मैं
कमाऊँ
शोहरतें
किसके
लिए
सागर
हाँ
जताने
को
कोई
होता
तो
होता
कुछ
Aniket sagar
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इक
शिकायत
रोज़
रहती
है
मुझे
और
दिल
में
रोज़
ख़लती
है
मुझे
बाप
आँसू
क्यूँ
दिखाता
है
नहीं
बात
'ना'
ही
ये
समझती
है
मुझे
रह
सकोगी
क्या
सनम
मेरे
सिवा
हर
घड़ी
जो
कॉल
करती
है
मुझे
मुस्कुराकर
दिल
चुराती
वो
मेरा
फिर
गले
से
रोज़
लगती
है
मुझे
काश!
मेरी
ज़िन्दगी
खुशहाल
हो
सुन
के
अक्सर
मौत
हँसती
है
मुझे
वो
रक़ीबों
से
हमेशा
मिलती
है
और
आकर
जान
कहती
है
मुझे
शौक़
से
करता
हूँ
सागर
शा'इरी
बस
अता
में
रोज़
मिलती
है
मुझे
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Aniket sagar
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