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Amit Kumar
ik ajab si ham sharar men aa ga.e hain
ik ajab si ham sharar men aa ga.e hain | इक अजब सी हम शरर में आ गए हैं
- Amit Kumar
इक
अजब
सी
हम
शरर
में
आ
गए
हैं
एक
लड़की
के
नज़र
में
आ
गए
हैं
लगता
है
पूछेगी
अब
वो
हाल
मेरा
हम
भी
सद
में
के
असर
में
आ
गए
हैं
इस
तरह
से
पेड़
को
काटे
हैं
हमने
जानवर
जंगल
से
घर
में
आ
गए
हैं
हम
जहाँ
से
निकले
थे
आए
वहीं
फिर
किस
तरह
के
हम
सफ़र
में
आ
गए
हैं
इस
तरह
से
छुप
के
रहते
इन
दिनों
हम
जब
दिखे
तो
हम
ख़बर
में
आ
गए
हैं
- Amit Kumar
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बे-ख़ुदी
बे-सबब
नहीं
'ग़ालिब'
कुछ
तो
है
जिस
की
पर्दा-दारी
है
Mirza Ghalib
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तेरी
आँखों
में
जो
इक
क़तरा
छुपा
है,
मैं
हूँ
जिसने
छुप
छुप
के
तेरा
दर्द
सहा
है,
मैं
हूँ
एक
पत्थर
कि
जिसे
आँच
न
आई,
तू
है
एक
आईना
कि
जो
टूट
चुका
है,
मैं
हूँ
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Fauziya Rabab
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जो
तेरी
बाँहों
में
हँसती
रही
है
खेली
है
वो
लड़की
राज़
नहीं
है
कोई
पहेली
है
हाँ
मेरा
हाथ
पकड़
कर
झटक
दिया
उसने
सहारा
दे
के
बताया
कि
तू
अकेली
है
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Tajdeed Qaiser
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वो
मेरा
जब
न
हो
सका
तो
फिर
यही
सज़ा
रहे
किसी
को
प्यार
जब
करूँँ
वो
छुप
के
देखता
रहे
Mazhar Imam
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क्यूँँ
इक
तरफ़
निगाह
जमाए
हुए
हो
तुम
क्या
राज़
है
जो
मुझ
से
छुपाए
हुए
हो
तुम
Shakeel Badayuni
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यूँँ
बे-तरतीब
ज़ख़्मों
ने
बताया
राज़
क़ातिल
का
सलीके
से
जो
मेरा
क़त्ल
गर
होता
तो
क्या
होता
Vikram Gaur Vairagi
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ये
हक़ीक़त
है,
मज़हका
नहीं
है
वो
बहुत
दूर
है,
जुदा
नहीं
है
तेरे
होंटों
पे
रक़्स
करता
है
राज़
जो
अब
तलक
खुला
नहीं
है
जान
ए
जांँ
तेरे
हुस्न
के
आगे
ये
जो
शीशा
है,
आइना
नहीं
है
क्यूँ
शराबोर
हो
पसीने
में
मैं
ने
बोसा
अभी
लिया
नहीं
है
उस
का
पिंदार
भी
वहीं
का
वहीं
मेरे
लब
पर
भी
इल्तेजा
नहीं
है
जो
भी
होना
था
हो
चुका
काज़िम
अब
किसी
से
हमें
गिला
नहीं
है
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Kazim Rizvi
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सभी
से
राज़
कह
देता
हूँ
अपने
न
जाने
क्या
छुपाना
चाहता
हूँ
Shariq Kaifi
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किसी
के
झूठ
से
पर्दा
हटाकर
हमारा
सच
बहुत
रोया
था
उस
दिन
Shadab Asghar
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जवाँ
होने
लगे
जब
वो
तो
हम
से
कर
लिया
पर्दा
हया
यक-लख़्त
आई
और
शबाब
आहिस्ता
आहिस्ता
Ameer Minai
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सारा
कुछ
आधा
आधा
करते
हैं
प्यार
हम
कितना
ज़्यादा
करते
हैं
क्या
अजब
है
कि
दूर
जाके
सब
लौटने
का
इरादा
करते
हैं
करता
है
रोने
का
कभी
जब
मन
हँसने
का
फिर
बहाना
करते
हैं
ज़िन्दगी
इक
लिबास
है
जिसको
सब
पहन
के
दिखावा
करते
हैं
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Amit Kumar
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मिल
गए
दो
किनारे
आपस
में
कितना
गहरा
है
इस
नदी
का
दुख
Amit Kumar
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सामने
रह
के
भी
दूरियाँ
होती
हैं
जिस
तरह
रेल
की
पटरियाँ
होती
हैं
Amit Kumar
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अब
न
जाने
क्यूँँ
लगा
रहता
है
ये
डर
साथ
मेरे
सारा
अच्छा
हो
रहा
है
Amit Kumar
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कुछ
इसलिए
उस
में
मिरा
मन
लगता
है
वो
ऐसा
क़ातिल
है
जो
सज्जन
लगता
है
दीवारें
आ
जाती
हैं
भाई
भाई
में
अब
थोड़ी
घर
का
घर
से
आँगन
लगता
है
नाख़ून
इतने
प्यारे
हैं
उसके
कि
वो
जो
घाव
भी
कर
दे
तो
चंदन
लगता
है
जितना
जले
मज़बूत
उतना
होगा
ये
जीवन
किसी
मिट्टी
का
बर्तन
लगता
है
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Amit Kumar
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