kya koi samjhe mire haalaat jab kahtaa hooñ main | क्या कोई समझे मिरे हालात जब कहता हूँ मैं

  - Amit Bajaj
क्याकोईसमझेमिरेहालातजबकहताहूँमैं
इकमुसलसलरौशनीकेसाएमेंरहताहूँमैं
जबहवाचलतीहैउड़ताहूँमुख़ालिफ़सम्तमें
औरजबथमजाएतबअपनीतरफ़बहताहूँमैं
तेरेमेरेलहजेकायेफ़र्क़कितनासाफ़है
तूमुझेकहतीहैतूऔरमैंतुझेकहताहूँमैं
आपसेमैंख़ुशहूँतोयेआपपरएहसानहै
इकअज़िय्यतहैख़ुशीभीहँसकेजोसहताहूँमैं
शामकेढलनेसेपहलेमैंकभीपीतानहीं
येभीसचहैदोपहरसतिश्ना-लबरहताहूँमैं
कूज़ा-गरयेसोचताहैयेउसीकाकामहै
इससलीक़ेसेकभीबनताकभीढहताहूँमैं
  - Amit Bajaj
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