vasl ki shab bhi KHafaa vo but-e-maghrur raha | वस्ल की शब भी ख़फ़ा वो बुत-ए-मग़रूर रहा

  - Ameer Minai
वस्लकीशबभीख़फ़ावोबुत-ए-मग़रूररहा
हौसलादिलकाजोथादिलमेंब-दस्तूररहा
उम्र-ए-रफ़्ताकेतलफ़होनेकाआयातोख़याल
लेकिनइकदमकीतलाफ़ीकामक़्दूररहा
जम्अ''किसदिनहुएमौसम-ए-गुलमेंमय-कश
रोज़हंगामातह-ए-साया-ए-अंगूररहा
गर्दिश-ए-बख़्तकहाँसेहमेंलाईहैकहाँ
मंज़िलोंवादी-ए-ग़ुर्बतसेवतनदूररहा
रास्त-बाज़ीकरअगरनामवरीहैदरकार
दारसेख़ल्क़मेंआवाज़ा-ए-मंसूररहा
वोतोहैचर्ख़चहारुमपेयेपचमोहल्लेपर
सचहैईसासेभीबालातिरामज़दूररहा
फ़स्ल-ए-गुलआईगईसेहन-ए-चमनमेंसौबार
अपनेसरमेंथाजोसौदावोब-दस्तूररहा
जल्वा-ए-बर्क़-ए-तजल्लीनज़रआयाकभी
मुद्दतोंजाकेवहाँमेंशजर-ए-तूररहा
ज़ुल्फ़रुख़दोनोंहैंजानेसेजवानीकेख़राब
मुश्कवोमुश्ककाफ़ूरवोकाफ़ूररहा
ग़ोल-ए-सहरानेमिरासाथछोड़ाशबभर
लेकेमशअलकभीनज़दीककभीदूररहा
हमभीमौजूदथेकलमहफ़िल-ए-जानाँमें'अमीर'
रातकोदेरतलकआपकामज़कूररहा
  - Ameer Minai
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