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Ambar
muqammal ho mere jazbaat chaahoon
muqammal ho mere jazbaat chaahoon | मुक़म्मल हो मेरे जज़बात चाहूँ
- Ambar
मुक़म्मल
हो
मेरे
जज़बात
चाहूँ
तुम्हें
चाहूँ
तुम्हारा
साथ
चाहूँ
न
झगड़ा
हो
कभी
मज़हब
को
लेकर
मुहब्बत
की
सदा
इक
ज़ात
चाहूँ
क़रीबी
दोस्तों
में
याद
रखना
वफ़ा
की
बस
यही
सौग़ात
चाहूँ
मेरे
दिल
में
बसी
है
इक
तमन्ना
तेरे
मेरे
मिलन
की
रात
चाहूँ
सभी
के
सामने
अपना
कहूँ
मैं
तुम्हें
इतनी
मेरी
औक़ात
चाहूँ
- Ambar
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बहुत
सी
हैं
जगह
रहने
कि
यूँँ
तो
मगर
औक़ात
का
अपना
मज़ा
है
Talib Toofani
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नाराज़गी
का
मेरी
ये
आलम
है
इन
दिनों
है
बंद
अपने
आप
से
भी
बोल-चाल
यार
Rajesh Reddy
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सौ
चाँद
भी
चमकेंगे
तो
क्या
बात
बनेगी
तुम
आए
तो
इस
रात
की
औक़ात
बनेगी
Dagh Dehlvi
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तसव्वुर
तजरबा
तेवर
तमन्ना
और
तन्हाई
मिलेंगे
फूल
सब
इस
में
ग़ज़ल
गुलदान
है
यारों
पढ़ाई
नौकरी
शादी
फिर
उसके
बाद
दो
बच्चे
हमारी
ज़िन्दगी
इतनी
कहाँ
आसान
है
यारों
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Tanoj Dadhich
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लहजा
ही
थोड़ा
तल्ख़
है
दुनिया
के
सामने
वैसे
तो
ठीक
ठाक
हूँ
मैं
बोल-चाल
में
Ankit Maurya
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साल
के
तीन
सौ
पैंसठ
दिन
में
एक
भी
रात
नहीं
है
उसकी
वो
मुझे
छोड़
दे
और
ख़ुश
भी
रहे
इतनी
औक़ात
नहीं
है
उसकी
Muzdum Khan
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तू
भी
सादा
है
कभी
चाल
बदलता
ही
नहीं
हम
भी
सादा
हैं
इसी
चाल
में
आ
जाते
हैं
Afzal Khan
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ये
हुनर
रब
ने
मेरी
ज़ात
में
रक्खा
हुआ
है
अच्छे
अच्छो
को
भी
औक़ात
में
रक्खा
हुआ
है
Fareeha Naqvi
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पहले
ख़याल
रख
मिरा
मेहमान
कर
मुझे
फिर
अपनी
कोई
चाल
से
हैरान
कर
मुझे
हैं
कौन
आप,
याद
नहीं,कब
मिले
थे
हम
इतना
भी
ख़ुश
न
होइए
पहचान
कर
मुझे
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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चराग़
दिल
का
मुक़ाबिल
हवा
के
रखते
हैं
हर
एक
हाल
में
तेवर
बला
के
रखते
हैं
Hastimal Hasti
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तेरी
बातें
मुझे
बेचैन
की
हैं
तेरा
भी
हाल
कुछ
ऐसा
ही
है
ना
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बदलना
सभी
का
चलेगा
मुझे
तुम्हारा
बदलना
खलेगा
मुझे
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करना
जो
था
वो
कर
नहीं
पाया
मैं
तो
मर
के
भी
मर
नहीं
पाया
आज
भी
उसको
याद
करता
हूँ
क्यूँ
मैं
अब
तक
सुधर
नहीं
पाया
जो
तमन्ना
उगाई
थी
हमने
बस
वही
इक
शजर
नहीं
पाया
ख़ाक
छानी
ज़माने
की
लेकिन
एक
तेरा
ही
दर
नहीं
पाया
वो
बुरा
लाख
था
मगर
वो
शख़्स
दिल
से
मेरे
उतर
नहीं
पाया
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ख़्वाब
नहीं
वो
आने
दूँगा
जिस
में
तुमको
जाने
दूँगा
बड़े
दिनों
के
बाद
मिले
हो
ऐसे
कैसे
जाने
दूँगा
सबको
प्यार
मुहब्बत
वाले
गली
गली
अफ़साने
दूँगा
तुमको
इतनी
आसानी
से
क्या
लगता
है
जाने
दूँगा
बाद
तुम्हारे
इस
जीवन
में
और
न
कोई
आने
दूँगा
मुझको
छोड़
के
जाने
वाला
आया
अगर
तो
ताने
दूँगा
चाहे
अब
जो
भी
हो
जाए
उसको
अब
न
सताने
दूँगा
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फिरसे
रिश्ता
निभा
सकते
हो
चाहो
गर
तो
मना
सकते
हो
अब
तो
इसकी
आदत
सी
है
तुम
भी
छोड़
के
जा
सकते
हो
ख़ाब
कि
जिस
में
हम
और
तुम
थे
सच
कर
के
दिखला
सकते
हो
मैंने
तुम
सेे
कब
ये
कहा
था
तारे
तोड़
के
ला
सकते
हो
लफ्ज़
वही
इज़हार-ए-वफ़ा
का
फिर
से
क्या
दोहरा
सकते
हो
'अंबर'
तुम
से
कुछ
नहीं
होगा
बस
बातें
ही
बना
सकते
हो
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