shab KHvaab ke jazeeron men hañs kar guzar gaii | शब ख़्वाब के जज़ीरों में हँस कर गुज़र गई

  - Ambar Bahraichi
शबख़्वाबकेजज़ीरोंमेंहँसकरगुज़रगई
आँखोंमेंवक़्त-ए-सुब्हमगरधूलभरगई
पिछलीरुतोंमेंसारेशजरबारवरतोथे
अबकेहरएकशाख़मगरबे-समरगई
हमभीबढ़ेथेवादी-ए-इज़हारमेंमगर
लहजेकेइंतिशारसेआवाज़मरगई
तुझफूलकेहिसारमेंइकलुत्फ़हैअजब
छूकरजिसेहवा-ए-तरब-ए-मोतबरगई
दिलमेंअजबसातीरतराज़ूहैइनदिनों
हाँनिगाह-ए-नाज़बतातूकिधरगई
मक़्सदसला-ए-आमहैफिरएहतियातक्यूँँ
बे-रंगरौज़नोंसेजोख़ुशबूगुज़रगई
उसकेदयारमेंकईमहताबभेजकर
वादी-ए-दिलमेंइकअमावसठहरगई
अबकेक़फ़ससेदूररहीमौसमीहवा
आज़ादताएरोंकेपरोंकोकतरगई
आँधीनेसिर्फ़मुझकोमुसख़्ख़रनहींकिया
इकदश्त-ए-बे-दिलीभीमिरेनामकरगई
फिरचार-सूकसीफ़धुएँफैलनेलगे
फिरशहरकीनिगाहतेरेक़स्रपरगई
अल्फ़ाज़केतिलिस्मसे'अंबर'कोहैशग़फ़
उसकीहयातकैसेभलाबे-बुनरगई
  - Ambar Bahraichi
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