nigaah-e-shauq ko jab teraa naqsh-e-paa na mila | निगाह-ए-शौक़ को जब तेरा नक़्श-ए-पा न मिला

  - Amanullah Khalid
निगाह-ए-शौक़कोजबतेरानक़्श-ए-पामिला
मुझेभीहुस्न-ए-हक़ीक़तकाआइनामिला
जिसेभीदेखोवहीअजनबीसालगताहै
तुम्हारेशहरमेंकोईभीआश्नामिला
हदूद-ए-दैर-ओ-किलीसामेंख़ानक़ाहोंमें
बहुततलाशकियाहमकोपारसामिला
तड़पतेरहगएदिनमेंभीरौशनीकेलिए
चराग़बेचनेवालोंकोमश'अलामिला
हमारेदर्सपेग़ैरोंनेपालियासाहिल
हमारेअपनेसफ़ीनेकोनाख़ुदामिला
सुकूँमिलेगाउन्हेंकिसकेआस्तानेपर
वोअहल-ए-दर्दजिन्हेंतेराआसरामिला
मता-ए-दिलवोमिरीलूटनेचलाथामगर
येऔरबातकिरहज़नकोहौसलामिला
मिरीवफ़ाओंपेइल्ज़ामतोबहुतआए
मिरीवफ़ाओंकामुझकोमगरसिलामिला
वफ़ाकेतज़्किरेहमनेबहुतसुने'ख़ालिद'
मगरजहाँमेंकोईहमकोबा-वफ़ामिला
  - Amanullah Khalid
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