mustehiq vo lazzat-e-gham ka nahin | मुस्तहिक़ वो लज़्ज़त-ए-ग़म का नहीं

  - Ali Ahmad Jalili
मुस्तहिक़वोलज़्ज़त-ए-ग़मकानहीं
जिसनेख़ुदअपनालहूचक्खानहीं
उसशजरकेसाएमेंबैठाहूँमैं
जिसकीशाख़ोंपरकोईपत्तानहीं
कौनदेताहैदर-ए-दिलपरसदा
कहदोमैंभीअबयहाँरहतानहीं
बनरहेहैंसतह-ए-दिलपरदाएरे
तुमनेतोपत्थरकोईफेंकानहीं
उँगलियाँकाँटोंसेज़ख़्मीहोगईं
हाथफूलोंतकअभीपहुँचानहीं
एकख़ुशबूसाथजोपलभररही
उम्रभरपीछामिराछोड़ानहीं
वोमक़ाम-ए-फ़िक्रहैमिरा'अली'
जिसबुलंदीतककोईपहुँचानहीं
  - Ali Ahmad Jalili
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