manzil-e-khwaab hai aur mahw-e-safar paani hai | मंज़िल-ए-ख़्वाब है और महव-ए-सफ़र पानी है

  - Akram Mahmud
मंज़िल-ए-ख़्वाबहैऔरमहव-ए-सफ़रपानीहै
आँखक्याखोलींकिता-हद्द-ए-नज़रपानीहै
आइनाहैतोकोईअक्सकहाँहैइसमें
क्यूँँबहाकरनहींलेजाताअगरपानीहै
एकख़्वाहिशकिजोसहरा-ए-बदनसेनिकली
खींचतीहैउसीजानिबकोजिधरपानीहै
पाँवउठतेहैंकिसीमौजकीजानिबलेकिन
रोकलेताहैकिनाराकिठहरपानीहै
अबभीबादलतोबरसताहैपरउसपारकहीं
किश्त-ए-बे-आबइधरऔरइधरपानीहै
खींचताहैकोईसय्यारातिरेप्यासोंको
उसइलाक़ेमेंजहाँख़ाक-बसरपानीहै
चश्म-ए-नमऔरदिललबरेज़बहुतहैंमुझको
ख़ित्ता-ए-ख़ाकहैऔरज़ाद-ए-सफ़रपानीहै
  - Akram Mahmud
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy