burrish-e-tegh bhi hai phool ki mahkaar bhi hai | बुर्रिश-ए-तेग़ भी है फूल की महकार भी है

  - Akhtar Ziai
बुर्रिश-ए-तेग़भीहैफूलकीमहकारभीहै
वोख़मोशीकिजोसदमौजिब-ए-इज़हारभीहै
छोड़िएउनकेशब-ओ-रोज़कीरूदाद-ए-ज़ुबूँ
आपकोख़ाक-नशीनोंसेसरोकारभीहै
मस्लहतमुझकोभीमलहूज़हैहम-सुख़नो
परमिरेपेश-ए-नज़रवक़्तकीरफ़्तारभीहै
मौतकेख़ौफ़सेहरसाँसरुकीजातीहै
ज़िंदगीआजकोईतेराख़रीदारभीहै
तल्ख़ी-ए-हालकोहैइशरत-ए-फ़र्दाकाफ़रेब
दिलजुनूँ-कोशहैऔरअक़्लतरहदारभीहै
मेरेमहबूबमुझेवक़्फ़-ए-तग़ाफ़ुलसमझ
ज़ीस्तकेलाखतक़ाज़ेहैंतेराप्यारभीहै
अहल-ए-गुफ़्तारकीतोभीड़लगीहै'अख़्तर'
देखनाइनमेंकोईसाहब-ए-किरदारभीहै
  - Akhtar Ziai
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