apni qismat men gham-e-arsa-e-hijraan hai to kya | अपनी क़िस्मत में ग़म-ए-अर्सा-ए-हिज्राँ है तो क्या

  - Akhtar Ziai
अपनीक़िस्मतमेंग़म-ए-अर्सा-ए-हिज्राँहैतोक्या
अश्कमिन्नत-कश-ए-गहवारा-ए-मिज़्गाँहैतोक्या
हुस्नअर्बाब-ए-हक़ीक़तकोहैनाज़ूरा-ए-हक़
शैख़जीआपकोअंदेशा-ए-ईमाँहैतोक्या
वक़्तकेसाथफ़ुज़ूँहोताहैएहसास-ए-ज़ियाँ
फ़हम-ओ-इदराकहीग़ारत-गर-ए-इंसाँहैतोक्या
बे-मुहाबानामसर्रतकेतआ'क़ुबमेंदौड़
दाम-ए-नैरंगपस-ए-सरहद-ए-इम्काँहैतोक्या
हमतोइकउम्रसेहैंमुंतज़िर-ए-मर्ग-ए-ख़िज़ाँ
अबकेलोगोंमेंअगरज़िक्र-ए-बहाराँहैतोक्या
मौसमआताहैतोकाँटोंहीमेंगुलखिलतेहैं
दस्त-ए-गुल-चींमेंअगरनज़्म-ए-गुलिस्ताँहैतोक्या
ज़ेर-ए-ता'मीरइसीहालमेंहैमुस्तक़बिल
इसमेंकुछरेख़्तकापहलूभीनुमायाँहैतोक्या
  - Akhtar Ziai
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