lab-e-sukoot pe ik harf-e-be-nava bhi nahin | लब-ए-सुकूत पे इक हर्फ़-ए-बे-नवा भी नहीं

  - Akhtar Saeed Khan
लब-ए-सुकूतपेइकहर्फ़-ए-बे-नवाभीनहीं
वोरातहैकिकिसीकोसर-ए-दुआभीनहीं
ख़मोशरहिएतोक्याक्यासदाएँआतीहैं
पुकारिएतोकोईमुड़केदेखताभीनहीं
जोदेखिएतोजिलौमेंहैंमेहर-ओ-माह-ओ-नुजूम
जोसोचिएतोसफ़रकीयेइब्तिदाभीनहीं
क़दमहज़ारजिहत-आश्नासहीलेकिन
गुज़रगयाहूँजिधरसेवोरास्ताभीनहीं
किसीकेतुमहोकिसीकाख़ुदाहैदुनियामें
मिरेनसीबमेंतुमभीनहींख़ुदाभीनहीं
येकैसाख़्वाबहैपिछलेपहरकेसन्नाटो
बिखरगयाहैऔरआँखोंसेछूटताभीनहीं
इसइज़्दिहाममेंक्यानामक्यानिशाँ'अख़्तर'
मिलावोहँसकेमगरमुझसेआश्नाभीनहीं
  - Akhtar Saeed Khan
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