aaj bhi dast-e-bala men nahar par pahra raha | आज भी दश्त-ए-बला में नहर पर पहरा रहा

  - Akhtar Saeed Khan
आजभीदश्त-ए-बलामेंनहरपरपहरारहा
कितनीसदियोंबादमैंआयामगरप्यासारहा
क्याफ़ज़ा-ए-सुब्ह-ए-ख़ंदाँक्यासवाद-ए-शाम-ए-ग़म
जिसतरफ़देखाकियामैंदेरतकहँसतारहा
इकसुलगताआशियाँऔरबिजलियोंकीअंजुमन
पूछताकिससेकिमेरेघरमेंक्याथाक्यारहा
ज़िंदगीक्याएकसन्नाटाथापिछलीरातका
शमएँगुलहोतीरहींदिलसेधुआँउठतारहा
क़ाफ़िलेफूलोंकेगुज़रेइसतरफ़सेभीमगर
दिलकाइकगोशाजोसूनाथाबहुतसूनारहा
तेरीइनहँसतीहुईआँखोंसेनिस्बतथीजिसे
मेरीपलकोंपरवोआँसूउम्रभरठहरारहा
अबलहूबनकरमिरीआँखोंसेबहजानेकोहै
हाँवहीदिलजोहरीफ़-ए-जोशिश-ए-दरियारहा
किसकोफ़ुर्सतथीकि'अख़्तर'देखतामेरीतरफ़
मैंजहाँजिसबज़्ममेंजबतकरहातन्हारहा
  - Akhtar Saeed Khan
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