uljhane aur badhaate kyuuñ ho | उलझनें और बढ़ाते क्यूँ हो

  - Akhtar Jameel Nazmi
उलझनेंऔरबढ़ातेक्यूँहो
मुझकोहरबातबतातेक्यूँहो
मैंग़लतलोगोंमेंघिरजाताहूँ
तुममुझेछोड़केजातेक्यूँहो
दिनमिराकाटेनहींकटताफिर
तुमज़रादेरकोआतेक्यूँहो
मैंनहींहाथलगानेवाला
इसक़दरख़ुदकोबचातेक्यूँहो
येभीतस्कीनकीसूरतहैकोई
उसकेख़तसबकोदिखातेक्यूँहो
वादी-ए-गुलसेगुज़रतेजाओ
हाथफूलोंकोलगातेक्यूँहो
मुझपेरौशनहैहक़ीक़त'नज़मी'
रोज़इकख़्वाबसुनातेक्यूँहो
  - Akhtar Jameel Nazmi
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