jurm-e-hasti ki saza kyun nahin dete mujh ko | जुर्म-ए-हस्ती की सज़ा क्यूँँ नहीं देते मुझ को

  - Akhtar Imam Rizvi
जुर्म-ए-हस्तीकीसज़ाक्यूँँनहींदेतेमुझको
लोगजीनेकीदु'आक्यूँँनहींदेतेमुझको
सरसर-ए-ख़ूँकेतसव्वुरसेलरज़तेक्यूँँहो
ख़ाक-ए-सहराहूँउड़ाक्यूँँनहींदेतेमुझको
क्यूँँतकल्लुफ़हैमिरेनामपेताज़ीरोंका
मैंबुराहूँतोभलाक्यूँँनहींदेतेमुझको
अबतुम्हारेलिएख़ुदअपनातमाशाईहूँ
दोस्तोदाद-ए-वफ़ाक्यूँँनहींदेतेमुझको
मैंमुसाफ़िरहीसहीरातकीख़ामोशीका
तुमसहरहोतोसदाक्यूँँनहींदेतेमुझको
जिंस-ए-बाज़ारकीसूरतहूँजहाँमैं'अख़्तर'
लोगशीशोंमेंसजाक्यूँँनहींदेतेमुझको
  - Akhtar Imam Rizvi
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