yuñ bhatkna dar-b-dar achha nahin lagta mujhe | यूँँ भटकना दर-ब-दर अच्छा नहीं लगता मुझे

  - Akhtar Azad
यूँँभटकनादर-ब-दरअच्छानहींलगतामुझे
बिनतुम्हारेयेसफ़रअच्छानहींलगतामुझे
प्यारकेइसखेलमेंअंजामसबकाएकहै
टूटनादिलकामगरअच्छानहींलगतामुझे
आसराअल्लाहकाकाफ़ीहैइंसाँकेलिए
हाथफैलाकरबशरअच्छानहींलगतामुझे
मैंबुराहूँयेभलाअपनीअनामेंमस्तहूँ
क्यूँँउधरजाऊँजिधरअच्छानहींलगतामुझे
आनेवालीनस्लकेहक़मेंदुआएँकीजिए
फूलसेचेहरोंपेडरअच्छानहींलगतामुझे
होतीहैबच्चोंसेरौनक़हरदर-ओ-दीवारकी
बिनपरिंदोंकेशजरअच्छानहींलगतामुझे
जिनघरोंमेंहोनहींशामिलदु'आमाँ-बापकी
कोईभीघरहोवोघरअच्छानहींलगतामुझे
  - Akhtar Azad
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