ye sanam rivaayat-o-naql ke hubl-o-manaat se kam nahin | ये सनम रिवायत-ओ-नक़्ल के हुबल-ओ-मनात से कम नहीं

  - Akhtar Ansari
येसनमरिवायत-ओ-नक़्लकेहुबल-ओ-मनातसेकमनहीं
तेराफ़िक्रवाइ'ज़-ए-हक़-नवाकिसीसोमनातसेकमनहीं
कहींबर्क़चमकेमैंजलउठूँकोईताराटूटेमैंरोपड़ूँ
येदिल-ए-सितम-ज़दाहम-नशींदिल-ए-काएनातसेकमनहीं
कहींरंग-ओ-नूर-ए-जमालहैकहींबीम-ओ-फ़िक्र-ए-मआलहै
कहींशामग़ैरत-ए-सुब्हहैकहींदिनभीरातसेकमनहीं
जिसेकहिएरक़्स-ए-शरार-ए-ग़मवोअगरहोशामिल-ए-ग़मतोफिर
ग़म-ए-दिलहोयाग़म-ए-ज़िंदगीग़म-ए-काएनातसेकमनहीं
येसुरूर'अख़्तर'-ए-दिल-ज़दारजज़-ए-बहार-ओ-शबाबहै
येबुलंदहोतीहुईफ़ुग़ाँअलम-ए-हयातसेकमनहीं
  - Akhtar Ansari
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