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Ajit Singh Badal
tum mile to hui ajeeb si baat
tum mile to hui ajeeb si baat | तुम मिले तो हुई अजीब सी बात
- Ajit Singh Badal
तुम
मिले
तो
हुई
अजीब
सी
बात
दोस्त
करने
लगे
रक़ीब
सी
बात
नींद
आए
तो
मख़मली
एहसास
वर्ना
बिस्तर
में
है
सलीब
सी
बात
फ़ल्सफ़ा
ज़िंदगी
का
मत
पूछो
मैं
कहूँगा
बड़ी
अजीब
सी
बात
तुम
यहाँ
दोस्त
से
मुख़ातब
हो
मत
करो
शाइ'र-ओ-अदीब
सी
बात
पूछ
मत
उन
के
सामने
'बादल'
मेरे
दिल
में
है
क्या
अजीब
सी
बात
- Ajit Singh Badal
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दिल
में
और
दुनिया
में
अब
नहीं
मिलेंगे
हम
वक़्त
के
हमेशा
में
अब
नहीं
मिलेंगे
हम
Jaun Elia
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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अगर
हमारे
ही
दिल
में
ठिकाना
चाहिए
था
तो
फिर
तुझे
ज़रा
पहले
बताना
चाहिए
था
Shakeel Jamali
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नहीं
ये
फ़िक्र
कोई
रहबर-ए-कामिल
नहीं
मिलता
कोई
दुनिया
में
मानूस-ए-मिज़ाज-ए-दिल
नहीं
मिलता
Asrar Ul Haq Majaz
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शक
है
तुझे
अगर
ये
अब
भी
गुदाज़
है
दिल
तो
सीने
से
कभी
ये
पत्थर
निकाल
मेरा
Abhay Aadiv
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झुकी
झुकी
सी
नज़र
बे-क़रार
है
कि
नहीं
दबा
दबा
सा
सही
दिल
में
प्यार
है
कि
नहीं
Kaifi Azmi
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हम
मिल
के
आ
गए
मगर
अच्छा
नहीं
लगा
फिर
यूँँ
हुआ
असर
कि
घर
अच्छा
नहीं
लगा
इक
बार
दिल
में
तुझ
सेे
जुदाई
का
डर
बना
फिर
दूसरा
कोई
भी
डर
अच्छा
नहीं
लगा
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Shriyansh Qaabiz
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तिरंगा
दिल
में
है
लबों
पे
हिंदुस्तान
रखता
हूँ
सिपाही
हूँ
हथेली
पे
मैं
अपनी
जान
रखता
हूँ
Shashank Shekhar Pathak
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जब
ज़रा
रात
हुई
और
मह
ओ
अंजुम
आए
बार-हा
दिल
ने
ये
महसूस
किया
तुम
आए
Asad Bhopali
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देखिए
होगा
श्री-कृष्ण
का
दर्शन
क्यूँँ-कर
सीना-ए-तंग
में
दिल
गोपियों
का
है
बेकल
Mohsin Kakorvi
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अकेले
को
भी
आती
है
हँसी
क्या
किसी
की
याद
ने
की
गुदगुदी
क्या
नज़र
आने
लगे
हर
हाल
में
तुम
हमें
अब
क्या
अँधेरा
रौशनी
क्या
ये
कम-कम
राब्ता
भी
ख़त्म
समझूँ
यही
है
आप
का
ख़त
आख़िरी
क्या
बने
जब
तक
न
साँसों
का
तवाज़ुन
नचाऊँ
उँगलियों
पर
बाँसुरी
क्या
वकालत
तेरा
पेशा
है
तो
'बादल'
करेगा
झूट
की
भी
पैरवी
क्या
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दूर
ही
से
निहार
लेंगे
हम
तुम
को
शर्मिंदा
क्या
करेंगे
हम
सूफ़ियों
की
तरह
जिएँगे
हम
दर्द
में
रक़्स
भी
करेंगे
हम
मुस्कुरा
कर
करो
हमें
रुख़्सत
तुम
भी
रोए
तो
क्या
करेंगे
हम
दे
के
जाते
हो
ज़िंदगी
की
दु'आ
क्या
तुम्हारे
बिना
जिएँगे
हम
अपने
घर
में
भले
लड़ें
झगड़ें
एक
ही
छत
तले
रहेंगे
हम
पहले
माँ-बाप
की
करें
ख़िदमत
बाल-बच्चे
भी
पाल
लेंगे
हम
ईद
का
रोज़
है
चलो
'बादल'
आज
उन
से
गले
मिलेंगे
हम
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Ajit Singh Badal
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यूँँ
दबे
पाँव
याद
आती
है
ले
के
दिल
का
क़रार
जाती
है
मैं
ने
परदेस
जा
के
देख
लिया
तेरी
ख़ुशबू
वहाँ
भी
आती
है
अब
तो
मुझ
को
मिरी
छटी
हिस
भी
तेरा
एहसास
ही
कराती
है
मेरे
हमदर्द
को
भी
ले
डूबो
मौज-ए-ग़म
अब
किसे
डराती
है
जिस
क़दर
हो
सके
कमा
नेकी
ये
बुरे
वक़्त
काम
आती
है
चाहे
कितनी
दबंग
हो
'बादल'
नाव
काग़ज़
की
डूब
जाती
है
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Ajit Singh Badal
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बन
में
रैन
बसेरा
होता
मैं
जागा
तू
सोया
होता
मेरा
हात
और
उस
का
दामन
काश
किसी
दिन
ऐसा
होता
तू
गद्दे
की
रानी
बनती
मैं
भंगड़े
का
राजा
होता
तेरे
चेहरे
के
दर्पन
में
अक्स
मिरी
चाहत
का
होता
सख़्त
सज़ा
देने
से
पहले
सच
क्या
है
समझाया
होता
घर
में
तू
दफ़्तर
की
उलझन
साथ
न
अपने
लाया
होता
उन
के
सात
कभी
तो
'बादल'
इक
थाली
में
खाया
होता
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Ajit Singh Badal
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उस
को
शायद
बुरी
लगे
सिगरेट
मत
जला
उस
के
सामने
सिगरेट
मेरा
महबूब
आने
वाला
है
और
कुछ
देर
साथ
दे
सिगरेट
मेरे
सीने
में
आग
है
ऐसी
फूँक
मारूँ
तो
जल
पड़े
सिगरेट
मत
बढ़ाओ
मिरी
तरफ़
साग़र
छीन
लो
मेरे
हाथ
से
सिगरेट
मेरी
भी
क्यूँ
ख़राब
की
मिट्टी
जाते
जाते
बता
तो
दे
सिगरेट
साँस
लेती
है
आख़िरी
'बादल'
ज़हर
साँसों
में
घोल
के
सिगरेट
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Ajit Singh Badal
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