jaltee dopahron men ik saaya sa zer-e-ghaur hai | जलती दोपहरों में इक साया सा ज़ेर-ए-ग़ौर है

  - Ahmed Sohail
जलतीदोपहरोंमेंइकसायासाज़ेर-ए-ग़ौरहै
बुझतीआँखोंमेंकोईचेहरासाज़ेर-ए-ग़ौरहै
अबकेमैंज़िंदारहूँयाफिरसेमरजाऊँ'सुहैल'
फ़ैसलासबहोचुकाथोड़ासाज़ेर-ए-ग़ौरहै
इतनीवीरानीमेंरौशनहोतिरीतस्वीरकब
इससुलगतेजिस्ममेंशो'लासाज़ेर-ए-ग़ौरहै
जिस्मकेआईनेमेंशो'लासारखाहैसवाल
पाँवकीज़ंजीरकोहल्क़ासाज़ेर-ए-ग़ौरहै
नींदउड़तीहीरहीख़्वाबोंकेजंगलमेंसदा
आसमाँपरचाँदकाख़ाकासाज़ेर-ए-ग़ौरहै
गरगईतारीख़मेरेहाथसेअहमद'सुहैल'
इकनएइंसानकाख़ाकासाज़ेर-ए-ग़ौरहै
  - Ahmed Sohail
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