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Faiz Ahmad
uske paighaam ne ummeed ko bhi tod diya
uske paighaam ne ummeed ko bhi tod diya | उसके पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया
- Faiz Ahmad
उसके
पैग़ाम
ने
उम्मीद
को
भी
तोड़
दिया
उसका
कहना
है
मुझे
पाने
की
कोशिश
न
करे
- Faiz Ahmad
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तेरे
वादे
से
प्यार
है
लेकिन
अपनी
उम्मीद
से
नफ़रत
है
पहली
ग़लती
तो
इश्क़
करना
थी
शा'इरी
दूसरी
हिमाक़त
है
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Mehshar Afridi
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एक
भी
उम्मीद
की
चिट्ठी
इधर
आती
नहीं
हो
न
हो
अपने
समय
का
डाकिया
बीमार
है
Kunwar Bechain
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हासिल
न
कर
पाया
तुझे
मैं
मिन्नतों
के
बाद
भी
उम्मीद
सेंटा
से
लगाना
लाज़मी
भी
है
मिरा
Harsh saxena
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बाक़ी
सारे
काम
भुलाकर
इश्क़
किया
सुब्ह
से
लेकर
शाम
बराबर
इश्क़
किया
ग़लती
ये
थोड़े
थी
इश्क़
किया
हम
ने
ग़लती
ये
थी
ग़ैर
बिरादर
इश्क़
किया
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Vashu Pandey
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शाख़-ए-उम्मीद
से
कड़वा
भी
उतर
सकता
हूँ
रोज़
ये
बात
मुझे
सब्र
का
फल
कहता
है
Rakib Mukhtar
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जानता
हूँ
कि
हवाएँ
तुझे
बहकाती
हैं
जा
चराग़ों
की
तरह
तू
भी
उजाला
कर
दे
ATUL SINGH
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किसी
उम्मीद
का
ये
इस्तिआरा
जान
पड़ता
है
कि
तन्हा
ही
सही
सच
झूट
से
अब
रोज़
लड़ता
है
Tarun Pandey
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लो
आज
हमने
तोड़
दिया
रिश्ता-ए-उम्मीद
लो
अब
कभी
गिला
न
करेंगे
किसी
से
हम
Sahir Ludhianvi
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जिसकी
फ़ितरत
ही
बे
वफ़ाई
हो
उस
सेे
उम्मीद-ए-वफ़ा
क्या
करना
Ajeetendra Aazi Tamaam
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मैं
हर
शख़्स
के
चेहरे
को
बस
इस
उम्मीद
से
तकता
हूँ
शायद
से
मुझको
दो
आँखें
तेरे
जैसी
दिख
जाएँ
Siddharth Saaz
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तुम्हारे
बाद
कुछ
नहीं
हुआ
सिवा
इसके
के
मेरी
वक़्त
से,
खु़दास,
खु़द
से
बनती
नहीं
Faiz Ahmad
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अदम
या
बूद
झूठ
है
ये
दश्त-ओ-रूद
झूठ
है
तिरी
अना
है
बरक़रार
तिरा
सुजूद
झूठ
है
न
गिन
मुझे
तू
अस्ल
में
मिरा
नुमूद
झूठ
है
हरम
में
है
न
दैर
में
तिरा
वुजूद
झूठ
है
असीरी
का
मरीज़
हूँ
मिरी
कु़यूद
झूठ
है
कि
बद-नसीबी
की
क़सम
तिरा
वरुद
झूठ
है
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Faiz Ahmad
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रुख़-ए-निगाह-ए-आतिशा
से
कलाम
कर
के
आ
रहे
हैं
हम
उन
निगाहों
को
सर-ए-रह
सलाम
कर
के
आ
रहे
हैं
Faiz Ahmad
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अपने
क़ाइफ़
से
इश्क़
हो
गया
है
दिल-ए-ख़ाइफ़
से
इश्क़
हो
गया
है
पढ़
रहा
हूँ
पुराने
ख़त
उसके
इन
लताइफ़
से
इश्क़
हो
गया
है
शाहज़ादा
हसब-नसब
वाला
और
तवाइफ़
से
इश्क़
हो
गया
है
दिख
रहा
है
धुएँ
में
चेहरा
तिरा
इन
लफ़ाइफ़
से
इश्क़
हो
गया
है
लग
रही
है
बहुत
शरीफ़
मुझे
इक
वसाइफ़
से
इश्क़
हो
गया
है
रोज़
आती
है
ख़्वाब
में
वो
'फैज़'
इस
कफ़ाइफ़
से
इश्क़
हो
गया
है
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Faiz Ahmad
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मुझ
में
हिम्मत
नहीं
है
क़यामत
सहूँ
मैं
तिरी
शादी
से
पहले
मर
जाऊँगा
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Faiz Ahmad
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