zaraa rahm kha mire zarf par zaraa apne rukh pe naqaab kar | ज़रा रहम खा मिरे ज़र्फ़ पर, ज़रा अपने रुख पे नक़ाब कर

  - Faiz Ahmad
ज़रारहमखामिरेज़र्फ़पर,ज़राअपनेरुखपेनक़ाबकर
मिरेइश्क़कीज़राक़द्रकरमिरीनीयतेंख़राबकर
येजहाँनहींहैयक़ीनका,तिरेजैसेक़ल्ब-ए-मुबीनका
तिरानेकहोनासहीनहीं,ज़राआदतोंकोख़राबकर
तिरेदमसेहीहैचमकरहीमिरीदिलकीगलीयोंमेंरौशनी
अभीयूँँजामुझेछोड़के,मिरीज़िंदगीअज़ाबकर
येजोदिनकटेहैंफ़िराक़में,येमिलागएमुझेख़ाकमें
कभीकेबैठक़रीबमें,कभीदूरियोंकाहिसाबकर
जिसेदेखकरयेतरबरहे,जिसेदेखनेकीतलबरहे
मिरीचश्म-ए-तरकोसुकूनदे,मिराऐसाकोईतोख़्वाबकर
तिरीयादमेंअबअसरनहीं,मिरेदिलमेंफितना-ओ-शरनहीं
मैंबदलजाऊँमुझेहैडर,मुझेफिरसेकेख़राबकर
वोजोज़िंदगीसेअज़ीज़थीतिरीबंदगीसेमिलीनहीं
तिराकिसतरहकायेअद्लहै,मिरीनेकियोंकाहिसाबकर
  - Faiz Ahmad
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