tumhaare gham ko main apna chuka hoon ab nahin aanaa | तुम्हारे ग़म को मैं अपना चुका हूँ अब नहीं आना

  - Faiz Ahmad
तुम्हारेग़मकोमैंअपनाचुकाहूँअबनहींआना
मैंज़ख़्मोंपरनमकलगवाचुकाहूँअबनहींआना
गईथीछोड़करजिसलड़केकोतन्हाबहुतपहले
उसेतोमैंकहींदफनाचुकाहूँअबनहींआना
बड़ीमुश्किलमेंजाकरदिलमेंयेदीवारबनपाई
मोहब्बतईटोंमेंचुनवाचुकाहूँअबनहींआना
तुम्हारीयादकेनाखु़नख़रोचेंहैंमिरेदिलको
ज़बान-ए-दिलकोपरसिलवाचुकाहूँअबनहींआना
मुसलसलचीख़तेतुमकोबुलातेथकगयाहूँमैं
तुम्हारेनामसेउकताचुकाहूँअबनहींआना
सुलगकररातदिनदिलबनगयाथाहिज्रमेंशोला
मैंअबइसआगकोभड़काचुकाहूँअबनहींआना
डरातीथीकभीमुझकोजोतन्हाईमैंदिलकोअब
उसीकीआँचपरधड़काचुकाहूँअबनहींआना
हमारेदर्दकामरहमकुछऔरहैअबतुमहो
मैंचारासाज़कोदिखलाचुकाहूँअबनहींआना
किशायददेखनापाएतिरीआंँखेंमिरीहालत
मैंख़ुदकोइसक़दरतड़पाचुकाहूँअबनहींआना
अबआगेतोनहींमुमकिनसुकूंँकोढूंँढनाअहमद
उसेकहनामैंपीछेजाचुकाहूँअबनहींआना
  - Faiz Ahmad
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