takhayyulaat ke aangan men jag-magaati hai vo | तख़य्युलात के आँगन में जग-मगाती है वो

  - Faiz Ahmad
तख़य्युलातकेआँगनमेंजग-मगातीहैवो
कुछऐसेमेरीग़ज़लकोग़ज़लबनातीहैवो
जुदातोहोगएहैंलेकिनअबभीदोस्तहैंहम
येसचनहींमगरइसकायक़ींदिलातीहैवो
बरशसेउसकीहीतस्वीरकोबनाताहुआ
कुछइसतरहमिरीतस्वीरकोबनातीहैवो
रहीनींदमेंराहत,जागनेमेंसुकून
ख़याल-ओ-ख़्वाबमेंकरबहुतसतातीहैवो
मुझेख़बरहैतमामआशिकोंकीउसके,मगर
किसीसेरब्तनहींहैयहीबतातीहैवो
बिछड़केइश्क़मेंकिसतरहख़ुशरहाजाए
मैंलाखपूछलूँ'अहमद'नहींबतातीहैवो
  - Faiz Ahmad
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