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Ahmad Razi Bachhrayuni
lagti hain gaali buildingein
lagti hain gaali buildingein | लगती हैं गाली बिल्डिंगें
- Ahmad Razi Bachhrayuni
लगती
हैं
गाली
बिल्डिंगें
सारी
ख़याली
बिल्डिंगें
तुम
भी
न
ठहरोगे
यहाँ
कहती
हैं
ख़ाली
बिल्डिंगें
मेरा
पता
आसेब-ए-जाँ
जिन
भूत
वाली
बिल्डिंगें
सड़कों
पे
सो
जाता
हूँ
मैं
मनहूस
काली
बिल्डिंगें
चलती
हवा
के
सामने
ठहरें
मिसाली
बिल्डिंगें
- Ahmad Razi Bachhrayuni
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मैंने
चाहा
भी
कि
फिर
इस
संग-दिल
पे
फूल
उगे
पर
तुम्हारी
रुख़्सती
के
बाद
ये
होता
नहीं
Siddharth Saaz
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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जाने
किस
किस
का
ख़याल
आया
है
इस
समुंदर
में
उबाल
आया
है
एक
बच्चा
था
हवा
का
झोंका
साफ़
पानी
को
खंगाल
आया
है
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Dushyant Kumar
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"उसके
हाथ
में
फूल
है"
मत
कहिए,
कहिए
उसका
हाथ
है
फूल
को
फूल
बनाने
में
Charagh Sharma
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यक़ीन
हो
तो
कोई
रास्ता
निकलता
है
हवा
की
ओट
भी
ले
कर
चराग़
जलता
है
Manzoor Hashmi
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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चल
दिए
घर
से
तो
घर
नहीं
देखा
करते
जाने
वाले
कभी
मुड़
कर
नहीं
देखा
करते
सीपियाँ
कौन
किनारे
से
उठा
कर
भागा
ऐसी
बाते
समुंदर
नहीं
देखा
करते
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Unknown
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तुम
न
टूटो
कभी
भी
इसलिए
पत्थर
है
कहा
मैं
तुम्हें
फूल
जो
कहता
तो
बिखर
जाती
तुम
Dipendra Singh 'Raaz'
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दिन
ढल
गया
और
रात
गुज़रने
की
आस
में
सूरज
नदी
में
डूब
गया,
हम
गिलास
में
Rahat Indori
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ख़ून
की
हर
बूँद
पत्थर
हो
चुकी
ज़िंदगी
ख़तरे
से
बाहर
हो
चुकी
आँधियों
की
ज़द
पे
ऐ
रेग-ए-रवाँ
बे-घरी
तेरा
मुक़द्दर
हो
चुकी
मैं
निकल
आया
हिसार-ए-जिस्म
से
सर्द
जब
शो'लों
की
चादर
हो
चुकी
एहतियातों
से
भी
कुछ
हासिल
नहीं
अब
तो
ये
मिट्टी
भी
बंजर
हो
चुकी
साया-ए-अक्स-ए-नवा
भी
मिट
गया
धूप
भी
मुट्ठी
बराबर
हो
चुकी
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Ahmad Razi Bachhrayuni
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मन
के
बरगद
तले
अँगारों
की
माला
भी
जपी
मुझ
से
गौतम
की
तरह
आग
में
चम्पा
न
खिली
रात
तन्हाई
ने
कमरे
में
जो
करवट
बदली
नींद
आँखों
को
किसी
साँप
के
फन
जैसी
लगी
मेरे
ही
साँस
से
मेरे
ही
बदन
की
चादर
कौन
समझाए
किसे
आए
यक़ीं
कैसे
जली
इस
भरे
शहर
में
अपनाया
किसी
ने
न
जिसे
मैं
ने
देखा
तो
'रज़ी'
लाश
वो
मेरी
निकली
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Ahmad Razi Bachhrayuni
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