kabhi tiri kabhi apni hayaat ka gham hai | कभी तिरी कभी अपनी हयात का ग़म है

  - Ahmad Rahi
कभीतिरीकभीअपनीहयातकाग़महै
हरएकरंगमेंनाकामियोंकामातमहै
ख़यालथातिरेपहलूमेंकुछसुकूँहोगा
मगरयहाँभीवहीइज़्तिराबपैहमहै
मिरेमज़ाक़-ए-अलम-आश्नाकाक्याहोगा
तिरीनिगाहमेंशो'लेहैंअबशबनमहै
सहरसरिश्ता-ए-उम्मीदबाँधनेवाले
चराग़-ए-ज़ीस्तकीलौशामहीसेमद्धमहै
येकिसमक़ामपेलेआईज़िंदगी'राही'
किहरक़दमपेअजबबेबसीकाआलमहै
  - Ahmad Rahi
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