jab bhi aankhoñ men tiri ruksat ka manzar aa gaya | जब भी आँखों में तिरी रुख़्सत का मंज़र आ गया

  - Ahmad Nadeem Qasmi
जबभीआँखोंमेंतिरीरुख़्सतकामंज़रगया
आफ़्ताब-ए-वक़्तनेज़ेकेबराबरगया
दोस्तीकीजबदुहाईदीतोशर्क़-ओ-ग़र्बसे
हाथमेंपत्थरलिएयारोंकालश्करगया
इससफ़रमेंगोतमाज़ततोबहुतथीहिज्रकी
मैंतिरीयादोंकीछाँवसरपेलेकरगया
गोज़मीन-ओ-आसमाँमसरूफ़-ए-गर्दिशहैंमगर
जबभीगर्दिशकासबबसोचातोचक्करगया
आदमीकोहश्रकेमंज़रनज़रआनेलगे
उसकेक़ब्ज़ेमेंजबइकज़र्रेकाजौहरगया
हुस्न-ए-इंसाँदफ़्नहोजानेसेमिटताहैकहाँ
फूलबनकरख़ाककेपर्देसेबाहरगया
अश्कजबटपकेकिसीबेकसकीआँखोंसे'नदीम'
यूँँलगातूफ़ानकीज़दमेंसमुंदरगया
  - Ahmad Nadeem Qasmi
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