kya poochte ho shahar men ghar aur hamaara | क्या पूछते हो शहर में घर और हमारा

  - Ahmad Javaid
क्यापूछतेहोशहरमेंघरऔरहमारा
रहनेकाहैअंदाज़इधरऔरहमारा
वोतेग़जानेकिधरउठतीहैअभीतो
झगड़ाहैदिल-ए-सीना-सिपरऔरहमारा
जबहोशमेंआएतोउसेदेखभीलेंगे
फ़िलहालहैअंदाज़-ए-नज़रऔरहमारा
येमोहरनिशाँतब्ल-ओ-अलमख़ूबहैलेकिन
बढ़जाएगाकुछबार-ए-सफ़रऔरहमारा
दिलऐसामकाँछोड़केयेहालहुआहै
यानीनिगह-ए-ख़ाना-बदरऔरहमारा
  - Ahmad Javaid
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