aise chup hain ki ye manzil bhi kaddi ho jaise | ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे

  - Ahmad Faraz
ऐसेचुपहैंकियेमंज़िलभीकड़ीहोजैसे
तेरामिलनाभीजुदाईकीघड़ीहोजैसे
अपनेहीसाएसेहरगामलरज़जाताहूँ
रास्तेमेंकोईदीवारखड़ीहोजैसे
कितनेनादाँहैंतिरेभूलनेवालेकितुझे
यादकरनेकेलिएउम्रपड़ीहोजैसे
तेरेमाथेकीशिकनपहलेभीदेखीथीमगर
येगिरहअबकेमिरेदिलमेंपड़ीहोजैसे
मंज़िलेंदूरभीहैंमंज़िलेंनज़दीकभीहैं
अपनेहीपाँवमेंज़ंजीरपड़ीहोजैसे
आजदिलखोलकेरोएहैंतोयूँँख़ुशहैं'फ़राज़'
चंदलम्होंकीयेराहतभीबड़ीहोजैसे
  - Ahmad Faraz
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