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Agnivendra Singh
mujhe bachne ka koi dar nahin hai
mujhe bachne ka koi dar nahin hai | मुझे बचने का कोई डर नहीं है
- Agnivendra Singh
मुझे
बचने
का
कोई
डर
नहीं
है
मिरी
बस्ती
में
चारा-गर
नहीं
है
हमारा
रतजगा
अब
आदतन
है
सो
कमरे
में
कोई
बिस्तर
नहीं
है
- Agnivendra Singh
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मैं
न
कहता
था
हिज्र
कुछ
भी
नहीं
ख़ुद
को
हलकान
कर
रही
थी
तुम
कितने
आराम
से
हैं
हम
दोनों
देखा
बेकार
डर
रही
थी
तुम
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Mehshar Afridi
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मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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भूचाल
की
धमकी
का
अगर
डर
है
तो
लोगों
इन
कच्चे
मकानों
को
गिरा
क्यूँ
नहीं
देते
Gyan Prakash Vivek
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तुम्हें
दिल
दे
तो
दे
'ताबाँ'
ये
डर
है
हमेशा
को
तुम्हारा
हो
न
जाए
Anwar Taban
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शे'र
दर-अस्ल
हैं
वही
'हसरत'
सुनते
ही
दिल
में
जो
उतर
जाएँ
Hasrat Mohani
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नई
सुब्ह
पर
नज़र
है
मगर
आह
ये
भी
डर
है
ये
सहर
भी
रफ़्ता
रफ़्ता
कहीं
शाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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शग़्ल
था
दश्त-नवर्दी
का
कभी
ऐ
'ताबाँ'
अब
गुलिस्ताँ
में
भी
जाते
हुए
डर
लगता
है
Anwar Taban
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मैं
बार
बार
तुझे
देखता
हूॅं
इस
डर
से
कि
पिछली
बार
का
देखा
हुआ
ख़राब
न
हो
Shaheen Abbas
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तो
क्या
उसको
मैं
होंठों
से
बजाऊँ
तिरे
दर
पे
जो
घंटी
लग
गई
है
चराग़
उसने
मिरे
लौटा
दिए
हैं
अब
उसके
घर
में
बिजली
लग
गई
है
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Fahmi Badayuni
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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हक़ीक़त
में
बहुत
आगे
खड़ा
है
वही
इक
शख़्स
जो
पीछे
खड़ा
है
किसी
भी
ग़ैर
के
पीछे
नहीं
हूँ
मिरा
साया
मिरे
आगे
खड़ा
है
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Agnivendra Singh
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ज़िन्दगी
में
सरा-ए-फ़ानी
में
आग
किसने
लगाई
पानी
में
कुछ
ज़ियादा
अज़ीज़
था
मुझको
शख़्स
जो
मर
गया
कहानी
में
चाय
पीते
हैं
चाँद
तकते
हैं
खोए
रहते
हैं
रात
रानी
में
ख़ुद-कुशी
का
ख़याल
आता
है
रोग
क्या
लग
गया
जवानी
में
रौशनी
को
तो
बुझना
होता
है
तीरगी
ही
है
ज़ाविदानी
में
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Agnivendra Singh
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कुछ
ज़ियादा
अज़ीज़
था
मुझको
शख़्स
जो
मर
गया
कहानी
में
चाय
पीते
हैं
चाँद
तकते
हैं
खोए
रहते
हैं
रात
रानी
में
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Agnivendra Singh
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अगर
नज़दीक
होता
प्यास
का
मसला
नहीं
होता
तुझे
मैं
चूम
लेता
फिर
कभी
प्यासा
नहीं
होता
Agnivendra Singh
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