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Agnivendra Singh
haqeeqat men bahut aage khada hai
haqeeqat men bahut aage khada hai | हक़ीक़त में बहुत आगे खड़ा है
- Agnivendra Singh
हक़ीक़त
में
बहुत
आगे
खड़ा
है
वही
इक
शख़्स
जो
पीछे
खड़ा
है
किसी
भी
ग़ैर
के
पीछे
नहीं
हूँ
मिरा
साया
मिरे
आगे
खड़ा
है
- Agnivendra Singh
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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परवरदिगार
आपके
सब
फैसले
अजीब
हैं
जो
तंग
था
वो
तंग
है
जो
ठीक
था
वो
मर
गया
Adnan Raza
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सच
की
डगर
पे
जब
भी
रक्खे
क़दम
किसी
ने
पहले
तो
देखी
ग़ुर्बत
फिर
तख़्त-ओ-ताज
देखा
Amaan Pathan
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क्या
ग़लत-फ़हमी
में
रह
जाने
का
सदमा
कुछ
नहीं
वो
मुझे
समझा
तो
सकता
था
कि
ऐसा
कुछ
नहीं
इश्क़
से
बच
कर
भी
बंदा
कुछ
नहीं
होता
मगर
ये
भी
सच
है
इश्क़
में
बंदे
का
बचता
कुछ
नहीं
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Tehzeeb Hafi
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मेरे
सीने
में
नहीं
तो
तेरे
सीने
में
सही
हो
कहीं
भी
आग
लेकिन
आग
जलनी
चाहिए
Dushyant Kumar
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हम
भी
तुमको
धोखा
दें
ये
ठीक
नहीं
आँख
के
बदले
आँख
कहाँ
तक
जायज़
है
Gaurav Singh
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कैसे
दिल
का
हाल
सही
हो
सकता
है
जब-तब
यूँँ
तुम
साड़ी
में
दिख
जाओगी
Tanha
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हमको
हकीम
ने
ही
किया
ठीक
दोस्तों
हम
पर
किसी
के
लम्स
ने
जादू
नहीं
किया
Tanoj Dadhich
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अगर
सच
इतना
ज़ालिम
है
तो
हम
से
झूट
ही
बोलो
हमें
आता
है
पतझड़
के
दिनों
गुल-बार
हो
जाना
Ada Jafarey
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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अगर
नज़दीक
होता
प्यास
का
मसला
नहीं
होता
तुझे
मैं
चूम
लेता
फिर
कभी
प्यासा
नहीं
होता
Agnivendra Singh
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ज़िन्दगी
में
सरा-ए-फ़ानी
में
आग
किसने
लगाई
पानी
में
कुछ
ज़ियादा
अज़ीज़
था
मुझको
शख़्स
जो
मर
गया
कहानी
में
चाय
पीते
हैं
चाँद
तकते
हैं
खोए
रहते
हैं
रात
रानी
में
ख़ुद-कुशी
का
ख़याल
आता
है
रोग
क्या
लग
गया
जवानी
में
रौशनी
को
तो
बुझना
होता
है
तीरगी
ही
है
ज़ाविदानी
में
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Agnivendra Singh
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कुछ
ज़ियादा
अज़ीज़
था
मुझको
शख़्स
जो
मर
गया
कहानी
में
चाय
पीते
हैं
चाँद
तकते
हैं
खोए
रहते
हैं
रात
रानी
में
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Agnivendra Singh
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मुझे
बचने
का
कोई
डर
नहीं
है
मिरी
बस्ती
में
चारा-गर
नहीं
है
हमारा
रतजगा
अब
आदतन
है
सो
कमरे
में
कोई
बिस्तर
नहीं
है
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Agnivendra Singh
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