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Afzal Sultanpuri
ha
ha | हमें क्यूँ आज़माया जा रहा है
- Afzal Sultanpuri
हमें
क्यूँ
आज़माया
जा
रहा
है
हमारा
प्यार
ज़ाया'
जा
रहा
है
इधर
हम
याद
करने
में
लगे
हैं
उधर
हमको
भुलाया
जा
रहा
है
दिलों
को
ग़म
बहुत
मिलने
लगा
है
न
जाने
क्यूँ
सताया
जा
रहा
है
यहाँ
से
भेजता
रहता
हूँ
पैसे
मगर
बिल
ही
बकाया
जा
रहा
है
तुम्हें
फिर
रोकना
कैसे
नहीं
हो
दिलों
पे
ज़ोर
ढाया
जा
रहा
है
- Afzal Sultanpuri
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ज़िंदगी
में
आई
वो
जैसे
मेरी
तक़दीर
हो
और
उसी
तक़दीर
से
फिर
चोट
खाना
याद
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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दिलों
को
तेरे
तबस्सुम
की
याद
यूँँ
आई
कि
जगमगा
उठें
जिस
तरह
मंदिरों
में
चराग़
Firaq Gorakhpuri
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आज
फिर
नींद
को
आँखों
से
बिछड़ते
देखा
आज
फिर
याद
कोई
चोट
पुरानी
आई
Iqbal Ashhar
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वो
किसी
को
याद
कर
के
मुस्कुराया
था
उधर
और
मैं
नादान
ये
समझा
कि
वो
मेरा
हुआ
Iqbal Ashhar
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इस
तरह
रोते
हैं
हम
याद
तुझे
करते
हुए
जैसे
तू
होता
तो
सीने
से
लगा
लेता
हमें
Vikram Gaur Vairagi
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किस
मुँह
से
करें
उन
के
तग़ाफ़ुल
की
शिकायत
ख़ुद
हम
को
मोहब्बत
का
सबक़
याद
नहीं
है
Hafeez Banarasi
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ख़ुदा
ने
यह
सिफ़त
दुनिया
की
हर
औरत
को
बख़्शी
है
कि
वो
पागल
भी
हो
जाए
तो
बेटे
याद
रहते
हैं
Munawwar Rana
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धोखा
है
इक
फ़रेब
है
मंज़िल
का
हर
ख़याल
सच
पूछिए
तो
सारा
सफ़र
वापसी
का
है
Rajesh Reddy
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बस
ये
दिक़्क़त
है
भुलाने
में
उसे
उसके
बदले
में
किस
को
याद
करें
Fahmi Badayuni
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जब
भी
कोई
मंज़िल
हासिल
करता
हूँ
याद
बहुत
आती
हैं
तेरी
ता'रीफ़ें
Tanoj Dadhich
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बंदा
जब
बद-हवा
से
हो
जाए
इश्क़
फिर
बे-लिबास
हो
जाए
डर
के
मारे
ही
मर
वो
जाएगा
मौत
जब
आस
पास
हो
जाए
आरज़ू
है
तुम्हारा
साथ
मिले
क्या
ही
पूरी
ये
आस
हो
जाए
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Afzal Sultanpuri
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यार
कैसे
खफ़ा
हुए
अफ़ज़ल
आग
बुझते
कज़ा
हुए
अफ़ज़ल
क़ैद
में
कर
लिया
गया
मुझको
हीर
रांझा
जुदा
हुए
अफ़ज़ल
चार
दिन
में
नशा
हुकूमत
का
शाह
देखो
ख़ुदा
हुए
अफ़ज़ल
कौन
ठहरे
यहाँ
कयामत
तक
राख़
होकर
फ़ना
हुए
अफ़ज़ल
जिस्म
का
साथ
छोड़
रूहों
ने
आज
फिर
बे-रिदा
हुए
अफ़ज़ल
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Afzal Sultanpuri
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ज़मीं
पर
जब
हुकूमत
हो
रही
थी
रिसालत
की
क़यादत
हो
रही
थी
नफ़ा
नुकसान
समझा
जा
रहा
है
मोहब्बत
में
तिजारत
हो
रही
थी
सफ़र
होता
मुकम्मल
किस
तरह
से
मुसलसल
जब
ख़िलाफ़त
हो
रही
थी
क़बीला
लुट
गया
कोई
न
आया
कहाँ
थे
जब
अज़ीयत
हो
रही
थी
लगा
के
आग
ख़ुश
शैतान
इतना
कहा
मेरी
हिमायत
हो
रही
थी
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Afzal Sultanpuri
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हाल
कैसा
बना
के
निकले
हो
ख़ैर
अच्छी
बला
से
निकले
हो
चैन
की
साँस
लो
मिरी
मानो
अपनी
इज़्ज़त
बचा
के
निकले
हो
गर्द-आलूद
हो
गई
हसरत
इश्क़
में
चोट
खा
के
निकले
हो
एक
पल
में
उजाड़
दी
दुनिया
घर
से
तुम
क्या
बता
के
निकले
हो
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Afzal Sultanpuri
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माजरा
क्या
है
हमें
कुछ
भी
समझ
आया
नहीं
ढूँढकर
थक
ही
गया
लेकिन
हमें
पाया
नहीं
Afzal Sultanpuri
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