jab ik saraab men pyaason ko pyaas utaarti hai | जब इक सराब में प्यासों को प्यास उतारती है

  - Afzal Khan
जबइकसराबमेंप्यासोंकोप्यासउतारतीहै
मिरेयक़ींकोक़रीन-ए-क़यासउतारतीहै
हमारेशहरकीयेवहशियानाआब-ओ-हवा
हरएकरूहमेंजंगलकीबासउतारतीहै
येज़िंदगीतोलुभानेलगीहमेंऐसे
किजैसेकोईहसीनालिबासउतारतीहै
तुम्हारेआनेकीअफ़्वाहभीसरआँखोंपर
येबाम-ओ-दरसेउदासीकीघासउतारतीहै
मैंसीख़-पाहूँबहुतज़िंदगीकीगाड़ीपर
येरोज़शाममुझेघरकेपासउतारतीहै
हमाराजिस्मसुकूँचाहताहैऔरयेरात
थकनउतारनेआतीहैमासउतारतीहै
  - Afzal Khan
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