shikast kha ke bhi kab hausale hain kam mire | शिकस्त खा के भी कब हौसले हैं कम मेरे

  - Afzal Gauhar Rao
शिकस्तखाकेभीकबहौसलेहैंकममेरे
मिरेकटेहुएहाथोंमेंहैंअलममेरे
पनाह-गाहमुझेभीतोसौरजैसीदे
मिरीतलाशमेंदुश्मनहैंताज़ा-दममेरे
तुझेमैंकैसेबताऊँकहाँसेकैसाहूँ
उलझरहेहैंब-दस्तूरपेच-ओ-ख़ममेरे
किसआसमानकीवुसअततलाशकरतेहुए
ज़मींसेदूरनिकलआएहैंक़दममेरे
तूयेसवालभीअबदजलाफ़ुरातसेपूछ
मैंक्याबताऊँकहाँलुटगएहरममेरे
जमीरहीहैचटानोंपेबर्फ़सदियोंतक
तोजाकेफिरकहींपत्थरहुएहैंनममेरे
  - Afzal Gauhar Rao
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