vo itr-e-khaak ab kahaan paani ki baas men | वो इत्र-ए-ख़ाक अब कहाँ पानी की बास में

  - Aftab Iqbal Shamim
वोइत्र-ए-ख़ाकअबकहाँपानीकीबासमें
हमनेबदललियाहैपियालागिलासमें
कलरातआसमानमिरामेहमाँरहा
क्याजानेक्याकशिशथीमिरेइल्तिमासमें
मम्नूनहूँमैंअपनीग़ज़लकायेदेखिए
क्याकामकरगईमिरेग़मकेनिकासमें
मैंक़ैद-ए-हफ़त-रंगसेआज़ादहोगया
कलशबनक़बलगाकेमकान-ए-हवासेमें
फिरयेफ़साद-ए-फ़िर्क़ा-ओ-मसलकहैकिसलिए
तूऔरमैंतोएकहैंअपनीअसासमें
  - Aftab Iqbal Shamim
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