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Adarsh Akshar
yaad aati hai tumhaari aaj bhi
yaad aati hai tumhaari aaj bhi | याद आती है तुम्हारी आज भी
- Adarsh Akshar
याद
आती
है
तुम्हारी
आज
भी
तुम
मुझे
उतनी
ही
प्यारी
आज
भी
- Adarsh Akshar
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जब
भी
कोई
मंज़िल
हासिल
करता
हूँ
याद
बहुत
आती
हैं
तेरी
ता'रीफ़ें
Tanoj Dadhich
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है
दु'आ
याद
मगर
हर्फ़-ए-दुआ
याद
नहीं
मेरे
नग़्मात
को
अंदाज़-ए-नवा
याद
नहीं
Saghar Siddiqui
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कुछ
इस
तरह
से
याद
आते
रहे
हो
कि
अब
भूल
जाने
को
जी
चाहता
है
Akhtar Shirani
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बिछड़
गया
हूँ
मगर
याद
करता
रहता
हूँ
किताब
छोड़
चुका
हूँ
पढ़ाई
जारी
है
Ali Zaryoun
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इक
अजब
हाल
है
कि
अब
उस
को
याद
करना
भी
बे-वफ़ाई
है
Jaun Elia
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एक
चेहरा
है
जो
आँखों
में
बसा
रहता
है
इक
तसव्वुर
है
जो
तन्हा
नहीं
होने
देता
Javed Naseemi
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सुनो
हर-वक़्त
इतना
याद
भी
मत
कीजिए
हमको
कहीं
ऐसा
न
हो
की
हिचकियों
में
जाँ
निकल
जाए
Sandeep dabral 'sendy'
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तेरी
मजबूरियाँ
दुरुस्त
मगर
तूने
वा'दा
किया
था
याद
तो
कर
Nasir Kazmi
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नहीं
आती
तो
याद
उनकी
महीनों
तक
नहीं
आती
मगर
जब
याद
आते
हैं
तो
अक्सर
याद
आते
हैं
Hasrat Mohani
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मैं
इस
ख़याल
से
शर्मिंदगी
में
डूब
गया
कि
मेरे
होते
हुए
वो
नदी
में
डूब
गया
Siraj Faisal Khan
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लड़की
थी
वो
अंबरी
सी
आँख
उसकी
मर्मरी
सी
तपता
जलता
जून
था
मैं
वो
थी
बिल्कुल
जनवरी
सी
बचपना
भीतर
छिपा
था
बात
करती
बावरी
सी
इक
नज़र
में
भा
गई
थी
वो
मुझे
तो
शा'इरी
सी
कोई
आख़िर
क्यूँ
सुनेगा
अब
कहानी
दुख
भरी
सी
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जिसकी
जैसी
मेहनत
होगी
उसकी
वैसी
क़िस्मत
होगी
हम
दोनों
गर
साथ
रहे
तो
इस
दुनिया
को
दिक़्क़त
होगी
मौक़ा
देकर
देखोगे
तो
सब
सेे
आगे
औरत
होगी
सब
को
इज़्ज़त
देने
से
ही
पास
तुम्हारे
इज़्ज़त
होगी
साफ़
रखो
इस
दिल
को
'अक्षर'
जब
जा
कर
ही
बरकत
होगी
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हम
बच्चों
के
रहबर
पापा
मिलते
सब
सेे
हँसकर
पापा
अच्छे
और
ग़लत
का
सबको
समझाते
थे
अंतर
पापा
पाँव
पसारो
चादर
जितनी
कहते
थे
ये
अक्सर
पापा
चार
बजे
ही
उठ
जाते
थे
खटते
थे
फिर
दिनभर
पापा
बच्चों
से
छिप
कर
रोते
थे
खाते
जब
जब
ठोकर
पापा
कपड़ों
के
शौक़ीन
बहुत
थे
सज
के
जाते
दफ़्तर
पापा
सख़्त
भले
हों
बाहर
लेकिन
नर्म
मुलाएम
अंदर
पापा
घर
का
सब
बोझ
उठाते
थे
थे
काफ़ी
ताक़तवर
पापा
संकट
के
सारे
बादल
को
कर
देते
छू
मंतर
पापा
सबके
सपने
पूरे
करते
सच
में
थे
जादूगर
पापा
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दिल
की
बातें
मुँह
पर
थी
वो
दुनिया
से
हट
कर
थी
नज़्में
मेरी
अच्छी
थी
ग़ज़लें
उसकी
बेहतर
थी
हर
मुश्किल
का
हल
रखती
माँ
मेरी
चारा-गर
थी
मैं
दुनिया
पर
निर्भर
था
दुनिया
मुझ
पर
निर्भर
थी
पाँव
बड़े
थे
'अक्षर'
के
लेकिन
छोटी
चादर
थी
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मेरे
हिस्से
का
आसमाँ
दे
दो
ख़ामियाँ
ले
लो
ख़ूबियाँ
दे
दो
प्यार
में
सब
को
फ़ेल
होना
है
जितने
भी
चाहे
इम्तिहाँ
दे
दो
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