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Ajeetendra Aazi Tamaam
dil ko na thii umeed ki badlega ye naseeb
dil ko na thii umeed ki badlega ye naseeb | दिल को न थी उमीद कि बदलेगा ये नसीब
- Ajeetendra Aazi Tamaam
दिल
को
न
थी
उमीद
कि
बदलेगा
ये
नसीब
लेकिन
बदल
गया
है
ख़ुदा
का
लिखा
हुआ
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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मिलने
की
तरह
मुझ
सेे
वो
पल
भर
नहीं
मिलता
दिल
उस
से
मिला
जिस
सेे
मुक़द्दर
नहीं
मिलता
Naseer Turabi
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अपनी
कि़स्मत
में
ही
जब
इश्क़
नहीं
है
यारो
किसलिए
अश्क-ए-लहू
इश्क़
में
जाया
करना
Ajeetendra Aazi Tamaam
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सितारे
कुछ
बताते
हैं
नतीजा
कुछ
निकलता
है
बड़ी
हैरत
में
हैं
मेरा
मुक़द्दर
देखने
वाले
Madan Mohan Danish
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ख़ुदी
को
कर
बुलंद
इतना
कि
हर
तक़दीर
से
पहले
ख़ुदा
बंदे
से
ख़ुद
पूछे
बता
तेरी
रज़ा
क्या
है
Allama Iqbal
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इसी
कारण
से
मैं
उसका
बदन
छूता
नहीं
यारों
मुझे
मालूम
है
क़िस्मत
में
वो
लिक्खा
नहीं
यारों
Harsh saxena
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कभी
पत्थर
मुक़द्दर
लिख
नहीं
सकता
मगर
समझो
जिसे
पत्थर
में
ढूँढो
हो
तुम्हारे
पास
ही
तो
है
Tanha
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तमाम
मस'अले
उठाए
फिर
रहे
हैं
हम
इसीलिए
भी
चलते
चलते
थक
गए
हैं
हम
थे
कितने
कम-नसीब
हम
कि
राबता
न
था
हैं
कितने
ख़ुशनसीब
तुझ
को
छू
रहे
हैं
हम
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Siddharth Saaz
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गर
ये
अच्छी
क़िस्मत
है
तो
लानत
ऐसी
क़िस्मत
पर
अपने
फोन
में
देख
रहे
हैं,
बाप
को
बूढ़ा
होते
हम
Siddharth Saaz
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ये
किस
ने
कहा
है
मिरी
तक़दीर
बना
दे
आ
अपने
ही
हाथों
से
मिटाने
के
लिए
आ
Hasrat Jaipuri
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मुझे
भी
अपनी
क़िस्मत
पर
हमेशा
नाज़
रहता
है
सुना
है
ख़्वाहिशें
उनकी
भी
शर्मिंदा
नहीं
रहती
सुना
है
वो
भी
अब
तक
खाए
बैठी
हैं
कई
शौहर
बहुत
दिन
तक
मेरी
भी
बीवियाँ
ज़िंदा
नहीं
रहती
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Paplu Lucknawi
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फ़स्ल-ए-गुल
है
समाँ
है
मस्ताना
आज
फिर
दिल
हुआ
है
दीवाना
यूँँ
तो
हर
आँख
में
नशा
लेकिन
उनकी
आँखों
में
पूरा
मयखाना
जबसे
आए
हैं
उनको
महफ़िल
में
भूल
बैठे
हैं
यार
घर
जाना
उनकी
महफ़िल
में
वो
सुकून
ए
दिल
जैसे
महफ़िल
नहीं
हो
बुत़खाना
क़ातिलाना
है
हर
अदा
उनकी
जान-लेवा
है
उनका
शर्माना
हम
सेे
पूछो
न
ज़ीस्त
का
आज़ी
हमने
कैसे
पिया
है
पैमाना
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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हर
शय
पे
दस्तकारियाँ
करते
हो
बे-मिसाल
बख़्शा
है
रब
ने
आपको
दस्त-ए-हुनर
कमाल
Ajeetendra Aazi Tamaam
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वो
जो
दर्द
ए
दिल
का
सुकून
था
वो
ही
चारा-गर
न
मिला
हमें
न
तो
ग़म
है
अब
न
मलाल
है
न
ख़फ़ा
है
दिल
न
गिला
हमें
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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कोई
बेचे
है
तन
तो
मन
कोई
सर
पे
अपनों
के
सर
बचाने
को
Ajeetendra Aazi Tamaam
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ढलते
निकलते
रहते
हैं
सूरज
के
साथ
साथ
आधे
अधूरे
लगते
हैं
शाम-ओ-सहरस
हम
Ajeetendra Aazi Tamaam
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