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Ajeetendra Aazi Tamaam
fasl-e-gul hai samaan hai mastaana
fasl-e-gul hai samaan hai mastaana | फ़स्ल-ए-गुल है समाँ है मस्ताना
- Ajeetendra Aazi Tamaam
फ़स्ल-ए-गुल
है
समाँ
है
मस्ताना
आज
फिर
दिल
हुआ
है
दीवाना
यूँँ
तो
हर
आँख
में
नशा
लेकिन
उनकी
आँखों
में
पूरा
मयखाना
जबसे
आए
हैं
उनको
महफ़िल
में
भूल
बैठे
हैं
यार
घर
जाना
उनकी
महफ़िल
में
वो
सुकून
ए
दिल
जैसे
महफ़िल
नहीं
हो
बुत़खाना
क़ातिलाना
है
हर
अदा
उनकी
जान-लेवा
है
उनका
शर्माना
हम
सेे
पूछो
न
ज़ीस्त
का
आज़ी
हमने
कैसे
पिया
है
पैमाना
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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अगर
लगता
है
वो
क़ाबिल
नहीं
है
तो
रिश्ता
तोड़ना
मुश्किल
नहीं
है
रक़ीब
आया
है
मेरे
शे'र
सुनने
तो
अब
ये
जंग
है
महफ़िल
नहीं
है
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Tanoj Dadhich
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ज़ेहन
से
यादों
के
लश्कर
जा
चुके
वो
मेरी
महफ़िल
से
उठ
कर
जा
चुके
मेरा
दिल
भी
जैसे
पाकिस्तान
है
सब
हुकूमत
करके
बाहर
जा
चुके
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Tehzeeb Hafi
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पहले
थोड़ी
मुश्किल
होगी
आगे
लेकिन
मंज़िल
होगी
सब
बाराती
शायर
होंगे
मेरी
शादी
महफ़िल
होगी
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Tanoj Dadhich
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बात
करनी
मुझे
मुश्किल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
जैसी
अब
है
तेरी
महफ़िल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
Bahadur Shah Zafar
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बहुत
चल
बसे
यार
ऐ
ज़िंदगी
कोई
दिन
की
मेहमान
तू
रह
गई
Dagh Dehlvi
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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मुझ
सेे
होकर
के
ही
बे-ज़ार
चले
जाते
हैं
मेरी
महफ़िल
से
मेरे
यार
चले
जाते
हैं
मुझको
मालूम
है
रहता
नहीं
है
अब
वो
वहाँँ
साल
में
फिर
भी
हम
इक
बार
चले
जाते
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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अदब
वाले
अदब
की
महफ़िलें
पहचान
लेते
हैं
उन्हें
तुम
प्यार
से
कुछ
भी
कहो
वो
मान
लेते
हैं
जहाँ
तक
देख
सकते
हैं
वहाँ
तक
सुन
नहीं
सकते
मगर
जब
इश्क़
हो
जाए
तो
धड़कन
जान
लेते
हैं
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Hameed Sarwar Bahraichi
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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मोहब्बत
करने
वाले
कम
न
होंगे
तिरी
महफ़िल
में
लेकिन
हम
न
होंगे
Hafeez Hoshiarpuri
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बनाए
चुनके
जितने
पासबाँ
सब
घरों
को
रोज़
लूटे
जा
रहे
हैं
बहुत
मजबूर
हैं
मालिक
घरों
के
लहू
के
घूँट
पीते
जा
रहे
हैं
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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हज़ारों
ख़्वाहिशें
काग़ज़
पे
ही
दम
तोड़
देती
हैं
है
स्याही
सुर्ख़
फिर
अपनी
क़लम
है
ख़ूँ-चकाँ
अपना
Ajeetendra Aazi Tamaam
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बचपन
से
ख़ुद
पे
दाँव
लगाते
रहे
हैं
हम
सीखी
है
खेल
खेल
में
हमने
शनावरी
Ajeetendra Aazi Tamaam
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नहीं
उस्ताद
कोई
उनके
जैसा
जो
समझाए
सुख़न
के
हर
भँवर
को
ग़ज़ल
है
मुंतज़िर
इस्लाह
को
इक
मिलो
गर
तुम
तो
ये
कहना
"समर"
को
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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पढ़नी
पड़ती
है
रोज़
ख़ामोशी
एक
सूरत
किताब
की
सी
है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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