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Ajeetendra Aazi Tamaam
banaaye chunke jitne paasbaan sab
banaaye chunke jitne paasbaan sab | बनाए चुनके जितने पासबाँ सब
- Ajeetendra Aazi Tamaam
बनाए
चुनके
जितने
पासबाँ
सब
घरों
को
रोज़
लूटे
जा
रहे
हैं
बहुत
मजबूर
हैं
मालिक
घरों
के
लहू
के
घूँट
पीते
जा
रहे
हैं
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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उसको
भी
उसकी
बाँहों
में
सोना
होगा
सोना
ही
है
रिश्तों
की
भी
मजबूरी
है
Umesh Maurya
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मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
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कभी
पहले
नहीं
था
जिस
क़दर
मजबूर
हूँ
मैं
आज
नज़र
आऊँ
न
ख़ुद
क्या
तुम
सेे
इतना
दूर
हूँ
मैं
आज
तुम्हारे
ज़ख़्म
को
ख़ाली
नहीं
जाने
दिया
मैंने
तुम्हारी
याद
में
ही
चीख़
के
मशहूर
हूँ
मैं
आज
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SHIV SAFAR
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तो
क्या
ये
हो
नहीं
सकता
कि
तुझ
से
दूर
हो
जाऊँँ
मैं
तुझ
को
भूलने
के
वासते
मजबूर
हो
जाऊँ
सुना
है
टूटने
पर
दिल
सभी
कुछ
कर
गुजरते
हैं
मुझे
भी
तोड़
दो
इतना
कि
मैं
मशहूर
हो
जाऊँ
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SHIV SAFAR
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मोहब्बत
के
इक़रार
से
शर्म
कब
तक
कभी
सामना
हो
तो
मजबूर
कर
दूँ
Akhtar Shirani
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ऐसे
हालात
से
मजबूर
बशर
देखे
हैं
अस्ल
क्या
सूद
में
बिकते
हुए
घर
देखे
हैं
हमने
देखा
है
वज़ादार
घरानों
का
जवाल
हमने
सड़कों
पे
कई
शाह
ज़फ़र
देखे
है
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Mehshar Afridi
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दिल
की
तकलीफ़
कम
नहीं
करते
अब
कोई
शिकवा
हम
नहीं
करते
Jaun Elia
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कब
तुम्हें
इश्क़
पे
मजबूर
किया
है
हमने
हम
तो
बस
याद
दिलाते
हैं
चले
जाते
हैं
Abbas Tabish
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यार
उसने
ही
किया
मजबूर
मुझको
मरने
पे
जो
ज़ियादा
रो
रहा
है
मेरे
मर
जाने
के
बाद
Shekhar kumar
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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ग़ुलामी
से
निकलना
है
अगर
तो
चराग़-ए-ज़ेहन
को
रौशन
करो
तुम
Ajeetendra Aazi Tamaam
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लगा
के
आँख
पे
देखा
तो
रहनुमा
पानी
हटा
के
आँख
से
देखा
तो
आइना
पानी
Ajeetendra Aazi Tamaam
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वो
जो
दर्द
ए
दिल
का
सुकून
था
वो
ही
चारा-गर
न
मिला
हमें
न
तो
ग़म
है
अब
न
मलाल
है
न
ख़फ़ा
है
दिल
न
गिला
हमें
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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ग़म-ज़दा
आँखों
का
पानी
बोलता
है
बे-ज़बानी
मार
ही
डालेगी
हमको
आज
उनकी
सरगिरानी
आपकी
हर
बात
वाजिब
और
हमारी
लंतरानी
जाने
किसकी
बद्दुआ
है
वक़्त-ए-गर्दिश
जाँ-सितानी
दर्द-ओ-ग़म
रास
आ
रहे
हैं
बुझ
रही
है
ज़िंदगानी
कौन
जाने
कब
कहाँ
से
आए
मर्ग-ए-ना-गहानी
ले
के
फागुन
आ
गया
फिर
फ़स्ल-ए-गुल
की
छेड़खानी
कैसे
मैं
समझाऊँ
ख़ुद
को
संग
दिल
है
मेरा
जानी
बोलते
हैं
चोर
अक्सर
शाह
ख़ुद
को
ख़ानदानी
कौन
जाने
रूह
क्या
है
फ़ानी
है
या
जावेदानी
मुफ़्लिसी
को
देखा
सोते
ओढ़कर
रंग
आसमानी
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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फैली
हुई
हैं
गाँव
में
ख़ुशियों
की
ख़ुश्बुएँ
चूल्हों
पे
आज
फिर
हैं
पतीले
चढ़े
हुए
Ajeetendra Aazi Tamaam
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