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Aatish Indori
chahti ho saunp doon dil tumko par zinda rahoon
chahti ho saunp doon dil tumko par zinda rahoon | चाहती हो सौंप दूँ दिल तुमको पर ज़िंदा रहूँ
- Aatish Indori
चाहती
हो
सौंप
दूँ
दिल
तुमको
पर
ज़िंदा
रहूँ
इसका
मतलब
लाश
हो
जाऊँ
मगर
ज़िंदा
रहूँ
- Aatish Indori
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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इतनी
सारी
यादों
के
होते
भी
जब
दिल
में
वीरानी
होती
है
तो
हैरानी
होती
है
Afzal Khan
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काम
अब
कोई
न
आएगा
बस
इक
दिल
के
सिवा
रास्ते
बंद
हैं
सब
कूचा-ए-क़ातिल
के
सिवा
Ali Sardar Jafri
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तो
क्या
ये
हो
नहीं
सकता
कि
तुझ
से
दूर
हो
जाऊँँ
मैं
तुझ
को
भूलने
के
वासते
मजबूर
हो
जाऊँ
सुना
है
टूटने
पर
दिल
सभी
कुछ
कर
गुजरते
हैं
मुझे
भी
तोड़
दो
इतना
कि
मैं
मशहूर
हो
जाऊँ
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SHIV SAFAR
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हम
मिल
के
आ
गए
मगर
अच्छा
नहीं
लगा
फिर
यूँँ
हुआ
असर
कि
घर
अच्छा
नहीं
लगा
इक
बार
दिल
में
तुझ
सेे
जुदाई
का
डर
बना
फिर
दूसरा
कोई
भी
डर
अच्छा
नहीं
लगा
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Shriyansh Qaabiz
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उस
के
दिल
की
आग
ठंडी
पड़
गई
मुझ
को
शोहरत
मिल
गई
इल्ज़ाम
से
Siraj Faisal Khan
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किस
तरह
'अमानत'
न
रहूँ
ग़म
से
मैं
दिल-गीर
आँखों
में
फिरा
करती
है
उस्ताद
की
सूरत
Amanat Lakhnavi
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निभेगी
किस
तरह
दिल
सोचता
है
अजब
लड़की
है
जब
देखो
ख़फ़ा
है
Fuzail Jafri
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दिल
में
और
दुनिया
में
अब
नहीं
मिलेंगे
हम
वक़्त
के
हमेशा
में
अब
नहीं
मिलेंगे
हम
Jaun Elia
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हम
तो
बचपन
में
भी
अकेले
थे
सिर्फ़
दिल
की
गली
में
खेले
थे
Javed Akhtar
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भला
वो
काहे
रोएगा
जिसे
ये
याद
होगा
कोई
वाशाद
होगा
तो
कोई
नाशाद
होगा
कोई
बर्बाद
होगा
तो
कोई
आबाद
होगा
सदा
ज़ीरो,
घटाने
जोड़ने
के
बाद
होगा
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Aatish Indori
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जब
से
हम
ज़िंदगी
को
समझने
लगे
तब
से
हम
ख़ुद-कुशी
को
समझने
लगे
बेवफ़ाई
सनम
आपने
जब
से
की
तब
से
हम
बंदगी
को
समझने
लगे
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Aatish Indori
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माँ
के
रहने
से
ही
पत्थर
पे
असर
होता
है
झोपड़ी
हो
या
क़िला
तब
कहीं
घर
होता
है
तरबतर
कोई
दु'आओं
से
अगर
होता
है
हर
किसी
के
लिए
वो
शख़्स
शजर
होता
है
तब्सिरा
फूल
नहीं
करता
कभी
ख़ुश्बू
का
इश्क़
ऐलान
नहीं
करता
अगर
होता
है
गुल
खिला
होता
तो
फिर
वाह
निकलना
तय
थी
वाह
तो
मिलती
ही
है
शे'र
अगर
होता
है
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Aatish Indori
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अलग
हूँ
सब
से
पर
कम-तर
नहीं
हूँ
दिलों
में
हूँ
कोई
बे-घर
नहीं
हूँ
मेरी
तौहीन
तुम
कैसे
करोगे
मैं
कब
से
जिस्म
के
अंदर
नहीं
हूँ
हमारा
साथ
इक
संयोग
हैं
बस
सफ़र
में
हूँ
मैं
भी
रहबर
नहीं
हूँ
रहूँगा
सामने
आँखों
के
हर-दम
गुज़र
जाए
जो
वो
मंज़र
नहीं
हूँ
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Aatish Indori
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इक
पे
टिकना
तेरी
आदत
में
नहीं
है
यह
सहूलत
पर
मुहब्बत
में
नहीं
है
आप
जब
से
जान-ए-जानाँ
बन
गए
हो
लुत्फ़
बिल्कुल
भी
मुहब्बत
में
नहीं
है
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Aatish Indori
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