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Aatish Indori
bade bhaagyashaali hain jinki kalaaee pe raakhi bandhi hai
bade bhaagyashaali hain jinki kalaaee pe raakhi bandhi hai | बड़े भाग्यशाली हैं जिनकी कलाई पे राखी बँधी है
- Aatish Indori
बड़े
भाग्यशाली
हैं
जिनकी
कलाई
पे
राखी
बँधी
है
चुनिंदा
ही
ऐसे
हैं
जिनके
सरों
पे
ये
पगड़ी
बँधी
है
- Aatish Indori
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एक
मुद्दत
वो
निगाहों
में
रहा
बाद
में
वो
मेरी
आहों
में
रहा
बेवफ़ाई
करना
आदत
हो
गई
ज़िंदगी
भर
वो
गुनाहों
में
रहा
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नींव
पूरी
उखाड़
दी
उसने
मेरी
हस्ती
उजाड़
दी
उसने
चाहता
अब
वो
है
जुदा
होना
आदतें
जब
बिगाड़
दी
उसने
कोई
भी
संग
मार
जाता
है
नींव
जब
से
उघाड़
दी
उसने
उसने
तय
कर
दिया
है
मुस्तक़बिल
नींव
में
राख
गाड़
दी
उसने
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तब
नया
साल
मैं
मनाऊँगा
जब
मेरे
फिर
से
तुम
हो
जाओगे
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हाथ
को
छूते
हुए
एक
गिलहरी
गुज़री
मुद्दतों
बाद
कोई
याद
पुरानी
गुज़री
छोटी
सी
बात
पे
बच्चों
ने
कहा
मर
जाओ
माँ
हँसी
ख़ूब
भले
दिल
से
सुनामी
गुज़री
कोई
गाली
दे
भले
मैं
उसे
गुल
देता
हूँ
ज़िंदगी
अच्छे
से
इस
वजह
से
मेरी
गुज़री
यूँँ
तो
कहने
को
मेरा
नाम
पता
पूछा
था
दूसरे
पल
में
तो
गर्दन
से
कटारी
गुज़री
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फूल
जब
कुछ
किताब
से
निकले
ढेर
लम्हे
गुलाब
से
निकले
जिस्म
निकला
है
निकली
हैं
साँसें
हम
कहाँ
तेरे
ख़्वाब
से
निकले
ज़िंदगानी
की
झील
में
झाँका
ढेर
किरदार
आब
से
निकले
पूछ
कर
लग
रहा
है
ग़लती
की
प्रश्न
ढेरों
जवाब
से
निकले
इस
तरह
मेरी
मौत
को
टाला
धीरे
धीरे
नक़ाब
से
निकले
इक
नज़र
आपकी
गिरी
मुझ
पर
रात
दिन
सारे
ख़्वाब
से
निकले
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