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Aatish Indori
haath ko chhoote hue ek gilhari guzri
haath ko chhoote hue ek gilhari guzri | हाथ को छूते हुए एक गिलहरी गुज़री
- Aatish Indori
हाथ
को
छूते
हुए
एक
गिलहरी
गुज़री
मुद्दतों
बाद
कोई
याद
पुरानी
गुज़री
छोटी
सी
बात
पे
बच्चों
ने
कहा
मर
जाओ
माँ
हँसी
ख़ूब
भले
दिल
से
सुनामी
गुज़री
कोई
गाली
दे
भले
मैं
उसे
गुल
देता
हूँ
ज़िंदगी
अच्छे
से
इस
वजह
से
मेरी
गुज़री
यूँँ
तो
कहने
को
मेरा
नाम
पता
पूछा
था
दूसरे
पल
में
तो
गर्दन
से
कटारी
गुज़री
- Aatish Indori
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वो
शाख़
है
न
फूल,
अगर
तितलियाँ
न
हों
वो
घर
भी
कोई
घर
है
जहाँ
बच्चियाँ
न
हों
Bashir Badr
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तितलियाँ
यूँँ
ही
नहीं
बैठ
रही
हैं
तुम
पर
बारहा
तुमको
भी
फूलों
में
गिना
जाता
है
Nasir khan 'Nasir'
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बोसा
जो
रुख़
का
देते
नहीं
लब
का
दीजिए
ये
है
मसल
कि
फूल
नहीं
पंखुड़ी
सही
Sheikh Ibrahim Zauq
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फिर
नज़र
में
फूल
महके
दिल
में
फिर
शमएँ
जलीं
फिर
तसव्वुर
ने
लिया
उस
बज़्म
में
जाने
का
नाम
Faiz Ahmad Faiz
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वक़्त
ही
कम
था
फ़ैसले
के
लिए
वर्ना
मैं
आता
मशवरे
के
लिए
तुम
को
अच्छे
लगे
तो
तुम
रख
लो
फूल
तोड़े
थे
बेचने
के
लिए
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Zia Mazkoor
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नाम
लिख
लिख
के
तिरा
फूल
बनाने
वाला
आज
फिर
शबनमीं
आँखों
से
वरक़
धोता
है
Ghulam Mohammad Qasir
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हज़ार
बर्क़
गिरे
लाख
आँधियाँ
उट्ठें
वो
फूल
खिल
के
रहेंगे
जो
खिलने
वाले
हैं
Sahir Ludhianvi
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सुलग
रहे
थे
शजर
दिल
तमाम
भँवरों
के
दिल
अपना
वार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
बहुत
मलाल
हुआ
देखकर
गुलिस्ताँ
में
तमाचा
मार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
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Shajar Abbas
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काँटों
में
घिरे
फूल
को
चूम
आएगी
लेकिन
तितली
के
परों
को
कभी
छिलते
नहीं
देखा
Parveen Shakir
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पहले
उसकी
ख़ुशबू
मैंने
ख़ुद
पर
तारी
की
फिर
मैंने
उस
फूल
से
मिलने
की
तैयारी
की
इतना
दुख
था
मुझको
तेरे
लौट
के
जाने
का
मैंने
घर
के
दरवाजों
से
भी
मुँह
मारी
की
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Tehzeeb Hafi
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उसकी
चाहत
की
थाह
देखूँगा
सब
सेे
पहले
निगाह
देखूँगा
क्या
मुझे
सिर्फ़
तुम
ही
देखोगे
मैं
भी
होते
तबाह
देखूँगा
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Aatish Indori
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यूँँ
तो
कोठियाँ
हैं
यहाँ
बहुत
मुझे
फिर
भी
लोग
मिले
नहीं
मैं
समझ
गया
भले
देर
से
बड़े
शहर
दिल
के
बड़े
नहीं
वो
हमारे
गाँव
में
आते
थे
बड़े
शहर
वाले
वो
लोग
थे
कभी
फ़ोन
उन
का
लगा
नहीं
कभी
वो
पते
पे
मिले
नहीं
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Aatish Indori
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यहाँ
मूढ़ों
का
अब
सम्मान
थोड़ी
है
पुराने
वाला
हिंदुस्तान
थोड़ी
है
सुख़नवर
हो
मगर
एसा
लब-ओ-लहजा
वतन
है
जंग
का
मैदान
थोड़ी
है
लब-ओ-लहजे
ने
ज़ाहिर
कर
दी
सच्चाई
मुहब्बत
का
तो
यह
एलान
थोड़ी
है
ज़रूरी
चीज़
है
हो
दिल
में
मानवता
बिना
इसके
कोई
इंसान
थोड़ी
है
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बात
तेरी
नहीं
समझ
सकता
चाह
कर
भी
नहीं
समझ
सकता
दूसरा
चुन
लिया
हो
जिसने
यार
बदहवा
सेी
नहीं
समझ
सकता
मुँह
में
ढेला
नमक
का
हो
जिसके
बात
मीठी
नहीं
समझ
सकता
रहता
हो
जो
तवायफ़ों
के
बीच
वो
कहानी
नहीं
समझ
सकता
आशिक़ी-वाशिक़ी
की
बातों
को
इक
शिकारी
नहीं
समझ
सकता
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Aatish Indori
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अलग
हूँ
सब
से
पर
कम-तर
नहीं
हूँ
दिलों
में
हूँ
कोई
बे-घर
नहीं
हूँ
मेरी
तौहीन
तुम
कैसे
करोगे
मैं
कब
से
जिस्म
के
अंदर
नहीं
हूँ
हमारा
साथ
इक
संयोग
हैं
बस
सफ़र
में
हूँ
मैं
भी
रहबर
नहीं
हूँ
रहूँगा
सामने
आँखों
के
हर-दम
गुज़र
जाए
जो
वो
मंज़र
नहीं
हूँ
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Aatish Indori
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