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Aatish Indori
man men jo bhi hai kaho bojh utar jaane do
man men jo bhi hai kaho bojh utar jaane do | मन में जो भी है कहो बोझ उतर जाने दो
- Aatish Indori
मन
में
जो
भी
है
कहो
बोझ
उतर
जाने
दो
रात
तो
रोज़
गुज़रती
है
गुज़र
जाने
दो
यार
इस
बोझ
ने
तो
थाम
दिए
हैं
पहिए
रेलगाड़ी
से
ये
सामान
उतर
जाने
दो
चीज़
हर
एक
तुम्हें
साफ़
दिखाई
देगी
पानी
मैला
है
अभी
थोड़ा
ठहर
जाने
दो
सुब्ह
होते
ही
सफ़र
पे
ये
निकल
जाएगा
आज
की
रात
परिंदे
को
ठहर
जाने
दो
- Aatish Indori
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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हैराँ
मैं
भी
हूँ
दोस्त
यूँँ
बालों
में
गजरा
देखकर
ये
फूल
आख़िर
कबसे
फूलों
को
पहनने
लग
गया
Neeraj Neer
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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और
फिर
लोग
यही
कहते
फिरेंगे
इक
दिन
यार
कल
ही
तो
मेरी
बात
हुई
थी
उस
सेे
Saad Ahmad
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दुश्मनी
कर
मगर
उसूल
के
साथ
मुझ
पर
इतनी
सी
मेहरबानी
हो
मेरे
में'यार
का
तक़ाज़ा
है
मेरा
दुश्मन
भी
ख़ानदानी
हो
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Akhtar Shumar
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भले
ही
प्यार
हो
या
हिज्र
हो
या
फिर
सियासत
हो
कुछ
ऐसे
दोस्त
थे
हर
बात
पर
अश'आर
कहते
थे
Siddharth Saaz
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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दुनिया
की
नज़रों
में
हम
तो
जोकर
हैं
सबको
ख़ुश
रक्खें
मतलब
वो
जोकर
हैं
ख़त्म
कहानी
कर
के
जब
तुम
ही
ख़ुश
हो
अपना
क्या
है
यार
अपन
तो
जोकर
हैं
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Nadim Nadeem
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एक
सीता
की
रिफ़ाक़त
है
तो
सब
कुछ
पास
है
ज़िंदगी
कहते
हैं
जिस
को
राम
का
बन-बास
है
Hafeez Banarasi
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दुआए
मांगते
हैं
इसीलिए
अपने
उजड़ने
की
हमें
तो
यार
तेरे
हाथ
से
तामीर
होना
हैं
Vishal Bagh
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डरों
को
जीत
लेना
ज़िंदगी
है
डरों
से
हार
जाना
ख़ुद-कुशी
है
Aatish Indori
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बहुत
पेपर
पे
छपने
हैं
तो
ठप्पा
काट
लेते
हैं
पिताजी
मर
गए
हैं
तो
अंगूठा
काट
लेते
हैं
मुकम्मल
हो
नहीं
पाया
वो
हिस्सा
काट
लेते
हैं
कहानी
से
मुहब्बत
वाला
क़िस्सा
काट
लेते
हैं
हमारे
हाथ
के
पोरों
पे
कोई
घाव
क्या
देता
हमीं
हैं
वे
जो
नाख़ूनों
को
गहरा
काट
लेते
हैं
मुहब्बत
के
महीने
को
अकेले
जब
निकाला
है
तुम्हारी
ज़िंदगी
से
यह
महीना
काट
लेते
हैं
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Aatish Indori
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गए
साल
का
इसलिए
शुक्रिया
है
नया
साल
लाया
नया
ख़्वाब
लाया
Aatish Indori
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भला
कब
मैं
निशाने
पर
नहीं
आया
मेरे
हाथों
में
पर
पत्थर
नहीं
आया
मैं
तौबा
दोस्ती
से
कर
तो
लूँ
लेकिन
हमेशा
पीठ
पे
ख़ंजर
नहीं
आया
कहीं
ठहरे
नहीं
फिर
भी
शिकायत
है
सफ़र
में
ख़ुशनुमा
मंज़र
नहीं
आया
निभाई
है
मुहब्बत
उम्र
भर
आतिश
मुहब्बत
में
कभी
अंतर
नहीं
आया
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Aatish Indori
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वज्ह
क्या
है
जो
किया
तुमने
ख़सारा
देखता
हूँ
इसलिए
पति
को
तेरे
तुम
सेे
ज़ियादा
देखता
हूँ
Aatish Indori
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