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Aatish Alok
maang nahin bhar paaya us kii
maang nahin bhar paaya us kii | माँग नहीं भर पाया उस की
- Aatish Alok
माँग
नहीं
भर
पाया
उस
की
दो
आँखों
को
भर
आया
हूँ
- Aatish Alok
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मनाने
को
शहंशाह
तो
कभी
शाह
कह
रही
हो
जो
मेरी
जाँ
तुम
मुझे
इक
बार
अपना
क्यूँ
नहीं
कहती
Aatish Alok
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कारण
तेरे
जाने
का
सबको
बोलो
क्या
बतलाऊँ
मैं
नम
आँखें
और
लंबी
आहों
से
कब
तक
काम
चलाऊँ
मैं
Aatish Alok
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घाव
मेरे
हरा
करे
कोई
क्यूँ
तुम्हें
बद्दुआ
करे
कोई
कैसे
कैसों
के
हाथ
आई
है
इश्क़
तेरा
भला
करे
कोई
बे-कली
ख़त्म
होती
जाती
है
ज़ख़्म
को
फिर
हवा
करे
कोई
शर्त
है
क़त्ल
हो
मेरा
और
ये
काम
भी
बे-वफ़ा
करे
कोई
रूह
छालों
से
भर
गई
हो
जब
ज़ख़्म
से
ही
सजा
करे
कोई
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Aatish Alok
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कभी
मिलो
तो
बताएँ
तुम्हें
कि
क्या
है
मुझे,
जिसे
समझते
हो
जन्नत
वही
सज़ा
है
मुझे
मैं
हर
किसी
को
तेरे
नाम
से
बुलाता
हूँ,
बिछड़
के
तुझ
सेे
अजब
रोग
लग
गया
है
मुझे
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Aatish Alok
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जो
रुका
हुआ
था
रुका
रहा
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
ये
अजब
रिवाज़
है
इश्क़
का
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
मैं
कभी
कभी
हूँ
ये
सोचता
कि
हवा
को
हाथ
से
रोक
लूँ
मैं
कभी
कभी
हूँ
ये
चाहता
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
न
मुझे
सुकून
न
नींद
ही
न
मिलेगा
चैन
ही
एक
दिन
ये
बहुत
दिनों
मुझे
खाएगा
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
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Aatish Alok
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